प्रतीत अर्थ:
रविवार, 4 मार्च 2012
सँझा भाखा निरगुन
प्रतीत अर्थ:
रविवार, 8 जनवरी 2012
चेतन भगत के अंग्रेजी उपन्यासों की लोकप्रियता पर विचार
बुधवार, 14 सितम्बर 2011
आमार तमारो हिन्दी
वृहत्तर हिन्दी क्षेत्र (विकिपीडिया से साभार)।
उत्तराखंड, हिमाचल, मध्यप्रदेश, झारखंड, छत्तीसगढ़
आदि के कुछ क्षेत्र छूटे हुये हैं।
विकि को सुधारने के लिये अंग्रेजी में लिखूँगा।
अभी कुछ महीनों पहले लघु उपन्यास ‘अग्निपरीक्षा’ को लिखते हुये शोध के चक्कर में अचानक ही मराठी ‘गीत रामायण’ से पाला पड़ा। गजानन दिगंबर माडगूळकर रचित और ‘ज्योति कलश छलके’ प्रसिद्धि वाले सुधीर फड़के द्वारा संगीतबद्ध और गायी गयी इस गीतमाला से इतना सम्मोहित हुआ कि सात आठ दिनों तक सुनता रहा। मेरे मोबाइल में इसके कुछ गीत हैं और गाहे बगाहे सुनता रहता हूँ।
रविवार, 10 जुलाई 2011
हिन्दी में (अपवाद को छोड़कर)....कचड़े की भारी मात्रा त्रासद है!
फेसबुक पर हुई एक जीवंत चर्चा को बिना किसी काँट छाँट के प्रस्तुत कर रहा हूँ। प्लेटफॉर्म का फ्लेवर रहेगा, यह ध्यान में रखते हुये इसे पढ़ें। इसे सम्पादित कर के डाला जाय या यूँ ही? इस पर अमरेन्द्र जी से चर्चा हुई और यह तय किया गया कि ऐसे ही छाप दिया जाय। यह चर्चा प्रमाणित करती है कि लोग ढंग से जुड़ें तो किसी भी प्लेटफॉर्म पर अच्छी और लम्बी चर्चा हो सकती है। चर्चा का प्रारम्भ अमरेन्द्र जी की पंक्तियों (वाल स्टेटस) से हुआ और इसे इन लोगों ने पसन्द किया।
Girijesh Rao, Rajani Kant, Aradhana Chaturvedi, RN Sharma, Arvind Mishra, Arvind K Pandey, Shalini Mehta, Nutan Gairola, Swapnil Tiwari, Tripurari Kumar Sharma, Gita Pandit, Satya Dubey, Saroj Singh, Bharat Dadhich, Amaresh Patel, Girish Pankaj, Bodhi Sattva, Tushar Devendrachaudhry, Rama Shanker Singh , Upendra Upen, Anjule Elujna, Sonal Rastogi, Priyamvad Ajaat, Sanjeeva Tiwari, Ashish Mishra, Anand Pandey, Mahesh Mishra Maral, Sushant Manu, Nishant Upadhyay, Arif Imran, Ishwari Dwivedi, Manas Khatri, Vimalendu Dwivedi, Aparna Manoj, Rakesh Pathak, Prasant Kumar Pandey, Ashish Pandey, ज्योत्स्ना पाण्डेय, Sharad Shrivastva, संतोष त्रिवेदी Santosh Trivedi, Vinod Kumar Singh, Chandra Bhal Singh, Sameer Yadav, Rajendra Awasthi, Saurabh Pandey, Santosh Chaturvedi, Navin Kumar, Chandan Kumar Jha, Hema Awasthi, Anurag Arya
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हिन्दी में (अपवाद को छोड़कर) कवि के पाठकों का दायरा बढ़ने के साथ उनका काव्य-पदार्थ घटने लगता है! इस राजभाषा के साहित्य में कचड़े की भारी मात्रा त्रासद है!
July 6 at 12:11am You, Arvind Mishra, Aradhana Chaturvedi, RN Sharma and 46 otherslike this.
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Saurabh Pandey शरदजोशी ने इसे ठीक उलट अंदाज़ में कहा था ..
"मैं ज्यादा लिखता हूँ इसलिये मैं घटिया लेखक हूँ.. . "July 6 at 12:31am · Like · 4 people
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Saurabh Pandey अमरेंद्र भइया, शुभ-शुभ.. अरसे बाद मुलाकात हुयी.
मानसजी प्रणाम.July 6 at 12:38am · Like
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Amrendra Nath Tripathi सौरभ जी, शरद जोशी जी व्यंग्य के धनी हैं, व्यंग्य का ट्रेंड रहा है कि परिवेश की विसंगति को स्वयं पर लाकर दिखा देना, इसमें उस छटपटाहट की करुण आहट भी रहती है जहां कह सकने का स्पेस घटा हो!
July 6 at 12:39am · Like · 4 people
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Bodhi Sattva सहमत....
July 6 at 12:39am · Like · 1 person
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Saurabh Pandey सही कहा आपने.. तभी तो शरदजी को उद्धृत कर आपको अनुमोदित किया मैंने.
July 6 at 12:41am · Like · 2 people
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Amrendra Nath Tripathi सौरभ जी, आपका सतत स्मरण रहा, सोच रहा था कि इस महीने के अंत तक व्यस्तता से थोड़ा हलुक हो आपके दरवाजे पर हल्ला करूंगा! आपका आशीष मिला, अच्छा लगा! सादर..!
July 6 at 12:44am · Like · 1 person
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Saurabh Pandey माईं बहुत मिस करता हूँ.. ओबीओ पर कभी आइये न.
July 6 at 12:50am · Like · 1 person
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Mahesh Mishra Maral जी उनके जीवन में अन्य पदार्थों की अधिकता काव्य-पदार्थ को विस्थापित कर देती है.... काव्य-पदार्थ को बनाए रखने के लिए स्वयं अपदार्थ होना पड़ता है निराला हों अथवा नागार्जुन....आपका कथन हिंदी रचनाधर्मिता की एक झुठ्लायी जा रही सच्चाई को उजागर करता है..धन्यवाद |
July 6 at 12:54am · Like · 9 people
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Priyankar Paliwal यह ज्यादा उपयोग (यानी दुरुपयोग) और गैररचनात्मक उपयोग से त्रस्त सभी बड़ी मानक भाषाओं की त्रासदी है. ताज़गी और रस को एक औसत उपयोगितावाद विस्थापित कर देता है. औसत आदमियों/कवियों की औसत भाषा पदार्थ उतना ही होगा जितना औसत आदमी की क्षमता है. हिंदी भाषा बेचारी का क्या दोष . राजभाषा का और साहित्य ?
July 6 at 1:12am · Like · 6 people
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Priyankar Paliwal * में
July 6 at 1:14am · Like
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प्रमाण-स्वरुप इस कविता को देखिये :
''कार से टकराते हुए
बचा वह आदमी भी
कार चलाती स्त्री को
देखकर मुस्कराया
गोया औरत के हाथों
मर जाना भी
कोई सुख हो ! ''
--- यह हमारे समय के हिन्दी बड़े युवा कवि की कविता है, हालिया तद्भव पत्रिका में छपी| कई पुरस्कार जीत चुके हैं, बड़े लोगों की प्रशस्तियाँ साथ में हैं| इस कविता में क्या विशेष काव्यत्व है, मेरी समझ में नहीं आया, अति सामान्य दर्जे की कविता लगी मुझे, ऐसी ही कई अन्य कवितायें ढकेली हुई हैं !
पालीवाल जी, हिन्दी में जितना फर्जीवाड़ा चलता है, उसे उतने ही ध्वनिमत की सराहना मिलती है! ऐसी विवेक-कुंद खेमेबाजी , सेटिंग और अंध-प्रोत्साहन अन्य जगह कम दिखा !July 6 at 1:35am · Like · 11 people
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Saurabh Pandey शब्द जब परिचय छोड़ कर आकार जीनेलगें तो समझिये भाव विस्थापित हुआ.
शब्द जब व्यवहार छोड़ कर प्रकार जीने लगें तो समझिये भाव विश्थापित हुआ.
भाव का विस्थापन मात्र रचना को नहीं पूरी भाषा को नंगा करता है.July 6 at 1:47am · Like · 4 people
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Amrendra Nath Tripathi समस्या एक सीमा तक सही है, लेकिन अब यही संस्कार बनाता जा रहा है, यही है सफलता का मानदंड भी, व्यापक स्वीकृति का हेतु भी! आह और वाह का जो जनवादी(?)-परिवेश आज की हिन्दी दुनिया में है, इसके सामने तो दरबारी रीतिकाल भी लज्जित हो जाए!
July 6 at 2:02am · Like · 4 people
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Dipankar Mishra खैर हिंदी की सारी पत्रिकाओं में तो कमोबेश इसी तरह की कवितायेँ दिखती हैं.तो मै तो इसे हीं अपने अल्प ज्ञान के कारण समकालीन हिंदी काव्य का स्तर मानता हूँ, अलबत्ता आजकल हिंदी के अच्छे कवि ,अगर हैं तो , क्या लिख रहे हैं कुछ सुचना दीजिये बड़ी कृपा होगी .
July 6 at 2:10am · Like · 4 people
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Dipankar Mishra और लोग बुरा न माने,लेकिन कहे बिना रहा नहीं जाता कि आपके स्टेटस पर आये अधिकांश कॉमेंट्स को देखकर लग रहा है कि ये लोग इसी भाषा में आपस में संवाद करते हैं क्या? अगर हाँ ,तो फिर ये भाषा तो अपन के सर के ऊपर से निकल गयी और और एक हीं तथाकथित हिंदी प्रदेश का होने के बावजूद शायद मै इन लोगों से सम्वाद न कर सकूँ ........कहना न होगा कि ऊपर लिखी लाइनों एक सम्बन्ध हिंदी काव्य कि समस्या से भी जुड़ता है .
July 6 at 2:24am · Like · 2 people
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दीपांकर जी, जब आपने कहा की हिन्दी के किसी कवि को बताऊँ, तो मैंने इस प्रश्न को इस तरह लिया की जैसे कोई किसान पूछा हो कि कोई आज की हिन्दी कविता बाँचो, हमहूँ समझें| और दुर्भाग्य से जो भी सुनाऊं वह कहे कि ऊपर से गुजर गयी| वह तो हिन्दी का ग्रामर...See More
July 6 at 3:23am · Like · 8 people
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Dinesh Srivastava ANT: Thanks for having a decent and meaningful discussion.
July 6 at 6:27am · Like · 2 people
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Girijesh Rao भोजपुरी कविताई का नमूना - भोलानाथ गहमरी:
गीत के हम हर कड़ी से पूछलीं, पूछलीं राग मिलन से,
छन्द छन्द लय ताल से पूछलीं, पूछलीं सुर के मन से
हिया हिया में पइस के पूछलीं, पूछलीं नील गगन से
कवने अतरे में लुकइलू, अहि रे बालम चिरई!July 6 at 6:43am · Like · 7 people
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amrendra jee, mai aapki is baat se sahamat hu. hindi ke hamare kavi gan pata nahi kis khamkhyali me dube rahte hai. darasal koe bhi rachna karna 'EK AAG KA DARIYA HAI AUR DUB KE JANA HAI'. mujhe aksar svayam hi apne likne se asantusti rahati hai. visay ke sath kitna nyay kar paya hu ise le kar bhi sanshay bana rahta hai. rhai lok ki baat to log apni kavitaao me uska tadka laga kar pesh karte hai jaise duniya ka koe aascharye unhone udghatit kar diya ho. sampresaniyata ka abhav rachna ko na kewal klist apitu lok se bhi door karta hai. ek abujh mayalok ka srijan karta hai.
July 6 at 7:37am · Like · 2 people
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abhi ek tippani ki thi, vah dikhee aur ghaayab hogayee. achchhaa sawaal uthaayaa hai, par kya yah vaastav mein sambhav hai ki kisi kavi ki kavita ek saath sab logon ki samajh mein aajaaye? kyaa yah sirf bhasha-muhavare ka maamlaa hai ya isse bhi adhik kavi ke jeevan-anubhav ka maamlaa bantaa hai? taajjub nahin hona chahiye ki kaviyon-lekhakon ka anubhav-sannsaar nirantar simattaa/sankuchit hotaa jaaraha hai. jan-bhasha ka bhi koi manak roop toh hai nahin. phir bhi, saarthak charchaa ki sambhaavanaaein prabal hain basharte kavi bhi bahas mein shaamil hon. baddhaai.
July 6 at 7:41am · Like · 4 people
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amrenra ji aapki baat se sahmat hoon,ye kavita pankaj chaturvedi ki hai aur naya gyanoday me chapi hai,chaturvedi ki do teen aur ghatiya kavitayen isi me saya hui hain...hindi ki jitni bhi patrikayen nikal rahi hain unme kavitaon ka star ekdum nimn koti ka hai...hindi sahitya me mulyankan ki ek kasuti hai ki:rachna per baat krne se pahle rachnakar ko mahan ghosit kr do,murad ye ki nirala mahan pahle hain aur kavi baad me,muktibodh ya shamsher ki kavitaon se pehle unke jivan shangharh ke baare me bata diya jata hai,is ka sidha niskarsh nikalta hai...mahan aadmi ki mahan kavita....
July 6 at 8:27am · Unlike · 6 people
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संतोष त्रिवेदी Santosh Trivedi zaahir hai jab lekhan samaj aur sahitya ko drishtigat nahin likha jayega,vyavsayikta uska avmoolyan kar deti hai...yadi maine sahi pakda hai to..!
July 6 at 8:27am · Like · 2 people
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Swapnil Tiwari सचमुच.....
July 6 at 10:40am · Like · 1 person
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संतोष त्रिवेदी Santosh Trivedi jayega =jaa rahaa
July 6 at 10:43am · Like
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रवि जी की टिप्पणी देवनागरी में - " अमरेन्द्र जी आपकी बात से सहमत हूँ ,ये कविता पंकज चतुर्वेदी की है और नया ज्ञानोदय में छपी है .चतुर्वेदी की दो तिन और घटिया कवितायेँ इसी में साया हुई हैं ....हिंदी की जितनी भी पत्रिकायें निकल रही हैं उनमे कविताओं का स्तर एकदम निम्न कोटि का है ...हिंदी सयित्य में मूल्यांकन की एक कसौटी है कि रचना पर बात करने से पहले रचनाकार को महान घोषित कर दो ,मुराद ये कि निराला महान पहले हैं और कवि बाद में ,मुक्तिबोध या शमशेर की कविताओं से पहले उनके जीवन संघर्ष के बारे में बता दिया है ,इसका सीधा निष्कर्ष निकलता है ..महान आदमी की महान कविता ..."
July 6 at 11:36am · Like · 1 person
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Gita Pandit जिसे आप सही मायने में कविता मानते हैं मैं चाहती हूँ उसके कुछ उदाहरण अवश्य दें..... एक अच्छी चर्चा जिसकी बहुत समय से आवश्यकता महसूस हो रही थी...." क्या जनवादी कविता ही असली कविता है......" जयशंकर प्रसाद ने जो कहा फिर वो....'वियोगी होगा......कविता अनजान.....क्या था ...??
July 6 at 11:42am · Like · 2 people
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Amrendra Nath Tripathi रवि जी, पत्रिका का नाम करेक्ट करने के लिए शुक्रिया ! मैंने कवि का नाम न लेना चाहा और आपने तो पूरा हवाला रख दिया ;-) .....बाकी मूल्यांकन में महानता को लेकर आपने जो कहा है, उससे सोरहौ आने सहमत हूँ, उल्टे किसी किसी की उपेक्षा इसलिए होती है की वह .........ऐसे जीवन संघर्ष में नहीं रहा, दलाली के चिट्ठे तक सूक्ष्मदर्शी से खोजे जाते हैं, फिर खारिजीकरण की अ-साहित्यिक क्रिया!
July 6 at 1:08pm · Like
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@Gita जी, सही कविता के लिए आपने कहा तो इस प्रश्न को देखिये भक्तिकाल के साहित्य पर विचार करते हुए, वह सैंकड़ों साल पहले का है पर है आज भी व्यापक/पुरअसर ! क्या कारण ? साफ है वह उस पाठक वर्ग के लिए संबोधित है जो झोपड़ी में है, जो बहुतायत में है, कबीर-सूर-तुलसी-मीरा के होने में उनकी भाषा और पाठक-केन्द्रित सोच दोनों अहम है, आज का हिन्दी साहित्य किस पाठक के लिये लिखा जाता है? पाठक कहां है? उल्टे बड़े होने की तैय्यारी में आलोचक केन्द्रित होकर लिखा जाता है, विचारधारा और जाने क्या क्या रखकर! एक खास किस्म की कृत्रिमता का लेखन! कभी कभी योरपीय साहित्य की रीमिक्स में स्वयं को गौरवान्वित समझना! यह सब जन-कटाव का कारण है। इसलिये वर्तमान की कविता की पहुंच का दायरा ज्यादा क्षेत्रफल से चूकने के साथ साथ हृदय पर असर डालने से भी चूका है।
July 6 at 1:25pm · Like · 6 people
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Chandrashekhar Chaubey Amrendra ji ,जब सारे पाठक कविया जाएंगे तो यही होगा !
July 6 at 1:37pm · Like · 1 person
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July 6 at 1:38pm · Like
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Dinesh Srivastava Gita Pandit: Ma'm, it might amuse you to know that the best poet this country produced in modern times- Tagore- was criticized severely by the "Janawadi"s for writing about esoteric subjects when ....
July 6 at 1:44pm · Like · 5 people
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Anurag Arya अभिव्यक्ति की बाढ़ में बहने वाली सबसे पहली चीज़ कविता ही है.......
July 6 at 2:00pm · Like · 1 person
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Amrendra Nath Tripathi अभिव्यक्ति की सहज बाढ़ सही पर (आज की) सायास लाई जाने वाली बाढ़, न न !
July 6 at 2:28pm · Like · 2 people
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भाई दीपंकरजी को अमरेंद्रजी का संतुलित उत्तर संतुष्ट कर पाया होगा. इस आशा के साथ मैं आगे कुछ नहीं कहूँगा. वैसे आप बुरा न माने तो इस तरह से अनायास लगते मगर सायास सवाल उछाल कर अपने को हिन्दी का बेलौस हितकारी समझना हिन्दी-साहित्य की इतनी क्षति कर चुका है कि क्या कोई तथाकथित ’जनवादी’ कवि या लॉबीकार कर पाया होगा. हिन्दी की रचनाएँ लाई-भूँजा नहीं हुआ करतीं कि चिल्लर फेंक चबेना बना लिया जाय. एकदम नहीं होनी चाहिये.
जिन सूर-तुलसी-कबीर या आज के ही महान रचनाकारों की रचनाओं के कालजयी होने की या उनके प्रतिबद्ध होने की बात की जा रही है, उन्हीं सूर-तुलसी-कबीर आदि को कौन समझा है बिना लगाव या प्रयास के???July 6 at 3:05pm · Like · 2 people
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क्लिष्ट क्या हैं? क्या अबूझ है? यदि तैयारी नहीं है तो क्या आप तेरह का पहाड़ा एक-सुर में बोल सकते हैं? नहीं.. हिन्दी तचनाएँ ही नहीं हर विषय का ककहरा हुआ करता है. .. गिनती हुआ करती है.. पहाड़े हुआ करते हैं. बिना बेसिक जानकारी के शोर मचाना कि विषय ही अबूझ है को मैं घटिया शोर और इस तरह के किसी बहस को थोथा चिंतन समझता हूँ. और इस तरह के किसी प्रयास से उपजे थोथेपन को घटिया साहित्य. जिसका लक्ष्य मनुष्य कदापि नहीं हुआ करता. और कौन मनुष्य??? किस मनुष्य की बात हो रही है? आम-आदमी कोई बकरी नहीं है. कि, कुछ भी हरा-हरा खिला दिया जाय. साहित्य का लक्ष्य सीख देना भी है. क्यों नहीं तैयार होते?
इस बात पर अलबत्ता मैं अमरेंद्रजी का अनुमोदन करूँगा कि बकवाद को साहित्य न माना जाय. मैं समझता हूँ कि इस बहस का मर्म इस के ही इर्द-गिर्द है और हम इसी के गिर्द रहें. वर्ना अ-पाठक के हड़बोंग मेम् सारा कुछ नष्ट होता रहा है और आगे भी ऐसा ही होता रहेगा.
//Tagore- was criticized severely by the "Janawadi"s for writing about esoteric subjects when ....//
Dineshji, thanks for your hints.July 6 at 3:22pm · Like · 1 person
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Saurabh Pandey @ Gita Pandit
//क्या जनवादी कविता ही असली कविता है..//
यह ’जनवादी’ है क्या?.. क्या जनेतर रचनाएँ भी होती हैं?? आपका इशारा बड़ा सटीक रहा. धन्यवाद.July 6 at 3:27pm · Like · 2 people
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Gita Pandit जी...भाषा के दुरूहता एक कारण रही है जो हिन्दी का विकास उस स्तर तक नहीं हो पाया जैसा कि होना चाहिए था...साहित्य केवल कोर्स की किताबों तक सिमट कर रह गया ...आज कविता की भाषा रीतिकालीन भाषा हो ही नहीं सकती ..जन मानस तक पँहुचने के लियें क्या आम बोलचाल की भाषा में सहज अभिव्यक्ति की आवश्यकता है...सायास लिखी गयी रचना को कविता का नाम नहीं दिया जा सकता...
July 6 at 3:36pm · Like · 3 people
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खैर हिंदी का हितकारी होने का दावा तो मेरा कभी नहीं रहेगा .मेरी मातृभाषा भोजपुरी है ,अमरेन्द्र जी की अवधी है और इनके विकास में बाधक होने पर मैं सायास हिंदी की छति करूँगा ,ये भी कहता हूँ ..और जिन कविताओं को पढने से पहले डॉ रघुवीर का कोष उलटना...See More
July 6 at 3:39pm · Like · 2 people
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//खैर हिंदी का हितकारी होने का दावा तो मेरा कभी नहीं रहेगा .मेरी मातृभाषा भोजपुरी है ,अमरेन्द्र जी की अवधी है और इनके विकास में बाधक होने पर मैं सायास हिंदी की छति करूँगा ,ये भी कहता हूँ ..//
भाई अमरेंद्रजी, ये कौन सी लॉबी बना कर बैठ गये?? ...See More
July 6 at 4:29pm · Like · 1 person
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Saurabh Pandey भाई अमरेंद्र.. मेरी इस उक्ति पर कुछ कहियेगा-
"सपाटबयानी रचना नहीं प्रतिक्रिया होती है और इस साहित्य का अलग दायरा है. इस घालमेल से ही सारा बवाल है."July 6 at 4:31pm · Like · 1 person
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Girijesh Rao विद्वान जनो! एक बात मन में आ रही है सो सहमते हुये कह रहा हूँ - मनोरंजन, चित्तानुरंजन आदि के बहुविकल्पीय जमाने में पारम्परिक फॉर्म (माने कागज और अक्षर) वाली कविता आम जन के लिये अब अप्रासंगिक और निरर्थक हो चुकी है। रही बात संस्कारित करने की तो वह गुण तो बहुत पहले ही खत्म हो चला है। वैसे संस्कारित होने की पड़ी ही किसे है? ...सलीमा का गाना गाओ, मस्त हो, भूल जाओ, फिर नया गाना गाओ ... सेत्ताराम ... काय कू टेंशन लेना यार!
July 6 at 8:13pm · Like · 2 people
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भाई, स्नेह असहमति का अधिकार भी देता है, सो कुछ बातें कह रहा।
दीपांकर जी, आयु में मुझसे कनिष्ठ और समझ/बुद्धि में मुझसे अधिक हैं, एतदर्थ मित्र हैं, इनके साथ में काफी सीखना हुआ है।
मैं मूलतः इस बात से ही असहमत हूं जहाँ यह माना जाय कि पाठक हमें समझने के लिये मेहनत करे, हम पाठक तक न जायें और पाठक मुझ तक आये। मैं विरोधी हूं इस बात का कि पाठक समझने के लिये अनिवार्यतः खास किस्म के शिक्षित/दीक्षित परिवेश में सभ्याचरित हो। वह भाषा जो पाठक के स्तर पर जाकर अपने का साहित्यीकरण न कर सके, वह संस्कृत सी सीमित भाषा हो सकती है, जन भाषा नहीं। वह एक खास ‘तंत्र’ की भाषा हो सकती है, जनभाषा नहीं। हाँ, हिन्दी को मैं जनभाषा नहीं मानता। हिन्दी उस परंपरा को देशभाषाओं के गला-घोटन के साथ ही कब का छोड़ आयी है, जिसमें कबीर थे, भक्ति काल का स्वर्णाभ था, जिसमें भिखारी ठाकुर रहे, रमई काका रहे। इन्होंने पाठक से सु-शिक्षित होने की कभी भी माँग ही नहीं की। इनकी साहित्यिकता पर क्या किसी को संदेह है?? वह कवि जो छाती ठोंक के कह रहा है ‘मसि कागज छुयो नहीं कलम गही नहिं हाथ’ वह भला क्यों पाठक के सु-शिक्षित होने की शर्त चाहेगा।
July 6 at 8:55pm · Like · 5 people
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भाई अमरेन्द्र जी आपने महत्त्वपूर्ण बात कही है , पर मुश्किल यह है कि सारी बातें बड़ी जल्दी शब्दों के घुमेर में पड़कर रह जाती हैं | वस्तुतः यह प्रश्न भाषा का नहीं कवि के अपने जीवन का है , इसे नकारना संभव न होगा कि कविता केवल बुद्धिविलास नहीं, वह अपने मूल में कहीं न कहीं कवि की जिंदगी को समेटे रहती है | काव्य-पदार्थ तो अनुभूति की उच्चावच स्थितियों से ही उपजता है, फिर फिर अपनी प्रकृति के अनुरूप भाषा में ढलकर सार्वजनिक होता है ; यहाँ कवि की बौद्धिकता का का स्थान है पर इससे पहले जो 'जीवन' है वह क्या है ? इसे देखना पड़ेगा |प्रियंकर पालीवाल जी की बात अवधेय है उपयोगिता के सम्बन्ध में...बल्कि इसे अज्ञेय के उस कथन से संदर्भित करना चाहिए जिसमे वो कहते हैं कि कविता (अथवा किसी भी कला के) साधक को अपनी कला से भिन्न आजीविका का साधन चुन लेना चाहिए | रेलगाड़ियों में '२-२ पैसे की कितबिया' बेचने वाले बाबा नागार्जुन का 'काव्य पदार्थ' मुक्तिबोध अथवा धूमिल का काव्य पदार्थ उनकी जिन्दगी से उपजा....आज हम आप इस समस्या को जिन कवि और कविताओं संदर्भित कर सकते हैं बिना नामोल्लेख के मैं कहना चाहता हूँ कि उनकी जिंदगी कविता को कहाँ छूती है ? इनसे ज्यादा तो राजू श्रीवास्तव और एहसान कुरैशी के व्यंग्य जिन्दगी को छूते है......महावीर प्रसाद द्विवेदी जी ने एक जगह कहा है कि कविता असभ्य समाज की चीज है , पहले मैं इस कथन से खिन्न था पर फिर इसे समझने का प्रयास किया , तो लगा कि अपेक्षाओं की पूर्तियों के साथ कविता की जगह सिमटती जाती है मंगलेश डबराल , लीलाधर जगूड़ी या फिर हाल के दौर में अपने मुहावरों से नामवर जी तक को चौंकाने वाले अष्टभुजा शुक्ल तक यही कहानी है | दीपांकर जी का तेवर सराहनीय है पत्रिकाएं क्यों निकल रही हैं इसको ये उनकी प्रबंधकारिणी ही जाने | मानक है 'सर्कुलेशन' वेदप्रकाश शर्मा के उपन्यासों या उन जैसी अन्य किताबों का का भी कम नही, इस सवाल को यूँ ही नही ताल सकते कि कोई एक समकालीन कविता सुनना चाहे तो उसे क्या सुना दिया जाय | जिंदगी जितनी उथली हो चली है उसमे किसी गहरायी की अपेक्षा ही बेमानी होती जा रही है.......
July 6 at 9:00pm · Like · 7 people
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रही बात सपाटबयानी..साहित्य ..आद आद की तो यह रमई काका की कविता काफी कुछ स्पष्ट कर रही है, साहित्य के संदर्भ में भी::
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‘‘ हिरदय की कोमल पंखुरिन मा,जो भंवरा अस ना गूँजि सकै |
उसरील हार हरियर न करै , टपकत नैना ना पोंछि सकै |
जेहिका सुनिकै उरबंधन की बेडी झनझनन न झंझनाय |
उन प्रानन मा पौरूख न भरै , जो अपने पथ पर डगमगाय |
अन्धियारू न दुरवै सबिता बनि, अइसी कबिता ते कौनु लाभ ?”
---------------------------------------------July 6 at 9:02pm · Like · 3 people
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Mahesh Mishra Maral बड़े भैया ! जे अंधियारे माँ है ते अंधियार दुरावै कै जुगुति करै, यै समकालीनै तौ हजारन वाट माँ चमचमात हैं इन्हैं कविता का सविता बनावै कै का परी है..आप तौ राजधानी माँ हौ...सब देखत समझत हौ....
July 6 at 9:09pm · Like · 5 people
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Amrendra Nath Tripathi मराल भइया, जब हियां देखेन कि सब कुछ धंधा के माफिक चलत है, बाहर से अउर, अउर तरे तरे अउरै कुछ! .. सही कहे रहे तुलसीदास(भिन्न माहौल मा भलहूँ) कि ‘सिर धुनि गिरा लागि पछिताना’!!
July 6 at 9:21pm · Like · 3 people
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Mahesh Mishra Maral बोली कै कविता अबहिओं बड़ी गरुहर है कहूँ-कहूँ , यही लिये की ऊ पीर से उपजी है...रमई काका , भिखारी ठाकुर, औ पढीस जी से लइकै मोती बी ए औ धरीक्षण मिसिर तक कविता 'काढ़ा' रही,फूंकि-फूंकि पियैक परत रहा मुला रही बड़ी अक्सीर , अब 'काफी' है बुज्जा भरा है... फूंकि दियौ जोर से तौ उड़ि जाय अइसै कबितौ कै हालि है...
July 6 at 9:21pm · Like · 3 people
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Mahesh Mishra Maral बस अइसै है तमाम कुछ...किसान के दुःख से गला जात हैं औ ५० कै पांच टिशू से आंस पोंछत हैं..असह्य आडंबर...अपने शब्द-वमन का कविता कहवावै खातिर रोज नया साहित्य-शास्त्र रचत हैं....
July 6 at 9:30pm · Like · 3 people
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Girijesh Rao गुरा जी से अच्छा ग्यान पाये आचारज जी! जुमला फेंको और फिर तमाशा देखो। बीच बीच में अगियारी भी करते चलो कि प्रबचन जारी रहे। ...बढ़िया है!
July 6 at 9:47pm · Like
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Amrendra Nath Tripathi Rao जी, हा हा हा ! बिलकुल गुरू जी कै सिस्य होई! उनके विराट पांडित्य के समझ विनम्र हूं, पर हूं कुजात शिष्य! ..भाय, पटरी नाय बैठत!..औ ई जुमला फेंकना तो हिन्दी का संस्कार है, अपन तो इसी के खिलाफ हैं, आप हम्हीं को धरपेट रहे हैं!!..क्या कहूं!!
July 6 at 9:56pm · Unlike · 2 people
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Mahesh Mishra Maral हल हुए हैं मसअले शबनम मिजाजी से मगर ,
गुत्थियाँ ऎसी भी हैं जिनको कि सुलझाती है आग...
तो अगियारी हर बार तमाशा देखने के लिए नही होती | जीवन के सन्दर्भ में उसकी अपनी जगह है..July 6 at 10:31pm · Unlike · 2 people
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Girijesh Rao वाह वस्ताद! क्या बात है!!
July 6 at 10:33pm · Like · 1 person
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Girijesh Rao काव्य-पदार्थ को परिभाषित करें आचार्य! समस्त उत्तरापथ आप को आशा भरी दृष्टि से निहार रहा है।
July 6 at 10:40pm · Like · 1 person
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Amrendra Nath Tripathi :) । गिरिदेव, आप कवि हैं, हिन्दी वाले कवि हैं, इसलिये यह मानने की धृष्टता जरूर करूंगा कि आपको ‘काव्य’ का बम्फाट अर्थ पता होगा, बाकी ‘सकल पदारथ हैं जगमाहीं....’ से पदार्थ-अर्थ निकालने में आपको दिक्कत नहीं होगी, आश्वस्त हूँ। बाकी उत्तरापथ भाड़ में जाय मुल आप जैसे विज्ञ को छोड़ किसी को अर्थ-ग्रहण में दिक्कत नहीं हुई, इसके लिये भी आश्वस्त हूँ! ;-)
July 6 at 10:49pm · Unlike · 1 person
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Girijesh Rao ;) हम कब से कवि हो गये? हे प्रभु ! बख्श दो। आप मुला लिखना चाह रहे थे शायद? ... आप की आश्वस्ति से चिंता का उन्मेष हो रहा है। उन्मेष का प्रयोग सही किया न ? ... चलिये अब सोवा जाय। निशाचर अब उपराने लगे हैं। :) आनन्ददायी रही यह चर्चा।
July 6 at 11:01pm · Like · 1 person
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Amrendra Nath Tripathi यक्कौ काम केरी बात नहीं किये, उल्टे आप राजभाषा-अधिकारी लगि रहे हैं, जनभाषा में कुछ लिखिये, हम तौ जौन कर रहे हैं, जग-जहिरै है प्रभु! ....‘नवोन्मेषशालिनी-आशा’ कैसा रहेगा?, आत्मतृप्तिदायी होगा?....हा हा हा ...शुभरात्रि, शब्बा खैर !!
July 6 at 11:10pm · Unlike · 2 people
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Girijesh Rao शालिनी, आशा, तृप्ति और शब्बा...अच्छा खैरखाही है ;)
July 6 at 11:13pm · Like
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Amrendra Nath Tripathi उर्मिल-शुभ-कामना!!
July 6 at 11:16pm · Unlike · 2 people
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//मैं मूलतः इस बात से ही असहमत हूं जहाँ यह माना जाय कि पाठक हमें समझने के
लिये मेहनत करे, हम पाठक तक न जायें और पाठक मुझ तक आये। //
पाठक हमें समझने के लिये मेहनत करे तथा हम पाठक तक न जायँ और फिर पाठक मुझ तक आए. धुर विरोधी बातों को एक लहजे में?? यह कब का कैसा आग्रह रहा है?
मैं विरोधी हूं इस बात का कि पाठक समझने के लिये अनिवार्यतः खास किस्म के शिक्षित/दीक्षित परिवेश में सभ्याचरित हो। वह भाषा जो पाठक के स्तर पर जाकर अपने का साहित्यीकरण न कर सके, वह संस्कृत सी सीमित भाषा हो सकती है, जन भाषा नहीं। वह एक खास ‘तंत्र’ की भाषा हो सकती है, जनभाषा नहीं। //
आपसे स्नेहसिक्त अनुरोध है कि आचार्य हज़ारी प्रसाद द्विवेदी जी के निबंध ’मनुष्य ही साहित्य का लक्ष्य है’ को भी संदर्भ में लें.
महावीर प्रसाद द्विवेदीजी ने पूरी दो पीढ़ियों को संस्कारित किया और आगे आपस्वयं मनीषी हैं.जहाँ तक रही हिन्दी के पदच्यूत होने या दायित्त्व से भटक जाने की बात तो संभवतः विचार ही खूँटे से विलग दीख रहा है. हम क्या छोटी-छोटी गुच्चियाँ नहीं बना रहे हैं समन्दर की खामखयाली में?? केशवदास जी या कहिये बिहारी तक को जन कवि नहीं
मान सकता, किन्तु साहित्य को खारिज करना... ??!!!
सादर.Thursday at 11:36am via · Like · 2 people
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Paritosh Mani साथी आदि काल से हिन्दी के साहित्य में कचरे ही की मात्र ही अधिक रही ,हाँ कचरे में से ही कभी कभी लाल मिल जाया करते हैं और जमाना उनके साहित्य को हाथ बड़ा कर स्वीकार करता है ,चिता की बात नहीं समय और पाठक से बड़ा कोई छननी नहीं है
Thursday at 7:37pm · Like · 1 person
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Gita Pandit छायावादी कविता का क्या...?? इस पर भी प्रकाश पड़े....
Thursday at 7:43pm · Like
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Saurabh जी, सर्वप्रथम स्नेह के लिये आभार! अब आगे आता हूं।
मेरी बातों में “धुर विरोध” नहीं दिखा मुझे। पुनः स्पष्ट करता हूं कि मैं विरोधी हूं इस बात का कि पाठक समझने के लिये अनिवार्यतः खास किस्म के शिक्षित/दीक्षित परिवेश में सभ्याचरित हो। पाठक जहां है, जिस भाषा के साथ है, लेखक उसका अनुसरण करे, न कि सामान्य पाठक ग्रामर/शब्दकोष/परंपरा-कोष आदि आदि से लैस हो कर साहित्य/साहित्यकार को समझने का अनुष्ठान/व्रत करे। व्यस्त जनता को इतना सभ्याचरित होने का स्पेस और समय नहीं है, यह तो कुछेक खाये पिये अघाये या विश्वविद्यालय में तैनात लोग ज्यादा सही से कर सकते हैं, सामान्य जन यह नहीं कर सकता तो साहित्य को क्या विशेष जनों की चीज न समझा जाय? निस्संदेह हिन्दी साहित्य तो विशेष जनों की चीज है, भाषा का जनता से “कटा हुआ टापू” देखना हो तो हिन्दी-साहित्य से मुफीद उदाहरण नहीं मिल सकता!
.........जारी।Thursday at 8:02pm · Like · 1 person
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Girijesh Rao छायावाद नाम ही गलत है।
Thursday at 8:06pm · Like
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Amrendra Nath Tripathi राव जी, अब खैर जो नाम है उसी से काम चलाना होगा, बाकी गीता जी की बात का जवाब दीजिये तो मामला फबे!
Thursday at 8:07pm · Like
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Girijesh Rao छाया पर प्रकाश डालें तो कैसे? छाया रह ही नहीं पायेगी। सोच में परि गवा हूँ।
तुलसी की विनय पत्रिका याद आ रही है। विद्वानों के बीच नीरभय नीरगुन गुन रे गाने का कबीर गन्धर्वी साहस अपन में नहीं।Thursday at 8:10pm · Like
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Amrendra Nath Tripathi आर्य-शिरोमणि, साहस कीजिये, “सीस उतारै, भुइं धरै, तब पैठै घर माहिं!!”[~कबीर]
Thursday at 8:12pm · Like
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Saurabh जी, रही बात द्विवेदी जी की और उनके द्वारा पीढ़ियों के संस्कारित आदि आदि की तो .....कहना चाहता हूं कि सीमाएँ हुजूर की हैं, द्विवेदी-द्वय की! स्व्तन्त्रता पूर्व वाले दूबे के सामने ब्रज भाषा और उर्दू के बरक्स हिन्दी लाने का राजनीतिक आयोजन में आहुति का दाय था, वहीं बाद वाले दूबे जन-भाषा के मसले पर मौन ही रहे, बावजूद की मध्यकाल की जनभाषा पर काफी लिखते रहे, पर अपने ही समकालीन राहुल सांकृत्यायन की कुछ जन-भाषायी मांग पर अन्य हिन्दी विद्वानों की तरह सुनियोजित मौन धारे रहे।
और तो और आजादी के बाद वाले दूबे तो अपने साहित्येतिहास ग्रंथ में भोजपुरी के कबीर को रखे मुला, खुद की मातृभाषा भोजपुरी होने के बाद भी, भोजपुरी के लिजेण्ड भिखारी ठाकुर को न शामिल कर सके। तो भाई यह तो हुजूर के जनभाषा और साहित्य के समझ दोनों की सीमा कही जायेगी! सादर..!
..........समाप्त।Thursday at 8:26pm · Unlike · 2 people
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Amrendra Nath Tripathi @ giri jee, कृपया अर्थ और समुचित विस्तार भी दिया करें, बामपंथियों की तरह जुमला फेंक के सरक लेना ठीक नहीं। यह अदा आपने कहां से सीखी??
Thursday at 8:36pm · Unlike · 1 person
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Gita Pandit ???? छायावाद नाम नहीं तो क्या नाम है उस काल का...प्लीज़...कहें...ये चर्चा अपने निष्कर्ष पर अवश्य पंहुचाई जानी चाहिए...
Thursday at 9:10pm · Like
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Amrendra Nath Tripathi Gita जी, अवश्य! मैं अपनी बात तो कहूंगा ही, लेकिन राव साहब का वेट कर रहा हूं कि मुझे जुमला फेकू कहने वाले आर्य गिरि जी कितने विस्तार में बात कह कर मेरा काम कम करते हैं या बढ़ाते हैं ;-)
Thursday at 9:53pm · Like
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उस समय की विधाओं का segregation अपने लिहाज से चल रहा था. हमने भिखारी ठाकुर को भी और बाद में मोती बीए को भी पढ़ा.. मुखियाजी आरा वाले को भी सुना.. हिन्दी से बिगाड़ नहीं रहा..
अब हम भी ’जुमला फेंकुओं’ [इस सामासिक शब्द के लिये अमदेंद्रजी बधाई..]की सीमाओं में उलझ अपने आप पर ही प्रश्न-चिह्न खड़ी करते जा रहे हैं. ऐसा क्यों. आपने बाँचा है, ओढ़ा है, बिछाया है. हमने भी ओढ़ा-बिछाया है. अब इस चादर के दायरे को पैबन्द ही सही लगाना गुनाह है क्या कि पैर पसरे?? दुखी हूँ पर निराश नहीं.
जिन पाठक की चर्चा है.. हुज़ूर.. वो बहाव वाले पानी का भ्रम तो देता है पर नीचेकी ओर रपटता है. वायव्य ही सही कुछ घनीभूत न हुआ तो काय क् रचना साहेब आ काय का कवित्त?? खाम-खयाली इधर भी.. खाये-पीये-अघाये उधर भी.
नज़र में सांकृत्यायन तो रहें मगर बउराना न रहे. सस्नेह-सादरFriday at 1:20pm · Like · 1 person
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Saurabh जी, संवाद अपनों से ही किये जाते हैं, इसलिये मेरी किसी बात को आप अन्यथा न लेवें, पर जोर दे के कहना चाहूंगा कि मैं किसी “बउराना” के तहत कुछ नहीं कह रहा, कई बार कहता आया हूं, एक लिंक भी दूंगा आपके देखने के निवेदन के ्साथ, जहां बहुत कुछ कहा हूं::
http://amrendrablog.blogspot.com/2011/03/blog-post_17.html
आर्य, हमारी मातृ भाषा न तो हिन्दी है, न ही अंग्रेजी। मेरे लिये अवधी मेरा अपना घर है, दूसरी भाषा अपनाना ही हो तो अंग्रेजी क्यों न अपनाऊं, हिन्दी से ज्यादा लाभ और पारदर्शी संभावनायें हैं जहां, वर्षों हिन्दी पढ़कर, और अब शोध करते हुये अपना भविष्य चौपट करने के अतिरिक्त हिन्दी से मैंने कुछ नहीं पाया, मातृभाषा होती तो भी आत्मतुष्टि का भाव कोई ग्लानि न करता। पर हिन्दी १-राजभाषा के ओहदे के साथ स्वार्थलिप्सुओं व अवसर-वादियों की साधना-भूमि है, २-सम्पर्क भाषा है, उत्तर भारत की, जिसे सम्पर्क भाषा बनाने में स्वतंत्रता आंदोलन के राष्ट्रवाद का ठोस आधार है, जो एक समय की जरूरत था उसे क्यों ढ़ोया जाय! .....अब राजभाषा-प्रेम के लिये जो अर्हता चाहिये( अर्हता, जैसे : आत्मा-बेचू-अवसरवाद और धूर्तता की ...आदि) वह मुझमें नहीं है, और संपर्क भाषा के तौर पर अंग्रेजी को ही क्यों न चुनूं जो उत्तर भारत क्या दक्षिन भारत और शेष विश्व से भी संपर्क की संभाव्यता रखती है।
निस्संदेह मैं उतना हिन्दी-विरोधी हूं जितना एक तमिल प्रेमी किसी समय हिन्दी विरोधी हुआ था। अवधी(देषभाषाओं) का दुख उस तमिल-पीड़ा का सगा है, न कि हिन्दी का। पिछले सौ वर्षों में हिन्दी ने जाने कितनों की मातृभाषा छीनी है, और आज भी तर्कहीन राष्ट्रवादी मनोविज्ञान का लाभ लिये जा रही है। Dipankar जी की पीड़ा इसी के विरुद्ध मुखर होकर सामने आयी है, Ravi जी ने संक्षेप में यही कहना चाहा है। Dinesh जी संभव है मेरी बात से इत्तेफाक रखें।
Mahesh मरा ल जी ने सर्कुलेसन को केंद्रीभूत कर अपनी बात कही है, आखिर हिन्दी के एलियन भाषा होने में ये स्थितियाँ नहीं है??
Gita जी ने छायावाद की बात करके सही सवाल किया है, जहाँ से महत्वपूर्ण सूत्र निकलता है, इसका जवाब अपनी तरफ से मैं लिखूगा लेकिन मैं इंतिजार कर रहा हूं बीच बीच जुमला-फेकू की भूमिका निभाने वाले और यही आरोप मुझ पर ठोंकने वाले गिरिजेश जी का, क्या वे कुछ विस्तार दे पाते हैं, या फिर ऐसे ही “जे बिनु काज दाहिने बायें” की भूमिका में आते रहे।
सादर..!Friday at 4:24pm · Like · 2 people
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Amrendra Nath Tripathi Girijesh जी आपका पुण्य-स्मरण ऊपर के कमेंट में हुआ है। सादर...!
Friday at 4:28pm · Like
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Dipankar Mishra @ अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी -हिंदी के गढ़ों-मठों पर जो साहसिक हमले आपने किये हैं उसके लिए साधुवाद .लेकिन सावधान आर्य ! ऐसी टिप्पणियां आपकी भविष्य की अकादमिक संभावनाओं पर ग्रहण लगा सकती हैं .
Friday at 5:07pm · Like · 1 person
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भाई अमरेंद्रजी, अपनी बात को आपने ठोस ढंग से संप्रेषित करने का प्रयास किया इस हेतु साधुवाद.
आपके प्रयासों और विन्दुवत विचारों से परिचित हूँ. आप ’बउरा’ नहीं सकते. ठीक.भाई मेरे, किन्तु..... इस ’किन्तु’ ने सिर्फ़ एक बात ने अगाह करने को मुझे उत्प्रेरित किया है.. .. अपनी विद्या और अपनी शिक्षा के बीच हम घालमेल न करें.
आपकी कुण्ठा कितनी जायज है या उसका होना कितनों को आकर्षित कर कितना ’अभिभूत’ कर सकता है यह अभी विषयान्तर होगा. एक सादर अनुरोध है कि आप यह तो कत्तई न करें कि तमिल के नाम पर मची उस ’नाडु’ की निरर्थक सी चिल्ल-पों के सुर में अपनी सार्थक ऊर्जा को जाया करें. भाषा रोटी का पर्याय होती तो ’माँ’ नहीं कहलातीं.
मैं नहीं जानता आपने तमिलनाडु के उस तथाकथित आन्दोलन को कितने निकट से जाना-समझा है. उस *हिन्दी-हिन्दु-हिन्दुस्तानी *के प्रति घृणा और सपाट विरोध की हकीकी मनोदशा क्या थी यह आप अवश्य जानें. आज उसी तमिलनाडु में स्थिति-परिस्थिति कितनी बदलती गयी है इसे भी हम समझें तो बेहतर. अंचल के आंचल में भाव पनपते हैं. और बोलियों के जोर पर भाषायें पुष्ट होती हैं. खैर.. अब आपने पैंतरा ही अजीब सा बदल लिया तो क्या कहूँ??!
साहित्य-क्षेत्र की परिधि में मेरी संज्ञा नगण्य़ और हीन है. किन्तु मुझे पाठक होने से कोई खारिज़ नहीं कर सकता न. आंचलिकता ने इस पाठक-धर्मिता को जितना बल दिया है वह मेरी थाती है. उस आंचलिकता को मैं बिसरा नहीं सकता न.
और रही अंग्रेज़ी की बात.. भाषाएँ बुरी कहाँ हुआ करती हैं. हाँ, अंग्रेज़ियत खतरनाक है न. भाई मेरे, उसी पलड़े में हिन्दी?? मैं हिल कर रह गया हूँ. न मैं किसी ’वाद’ का संपोषक हूँ, न किसी तथाकथित आंदोलन का हिस्सा. संप्रेषणीयता मानक है. बस. अपनी धूल-माटी में उपजे बिरवे को किसी पराये आर्किड से तुलना करना
क्या अवसरवादियों को आश्वस्त नहीं करेगा? मैं जानता हूँ आक्रमण कम नहीं हैं. किन्तु, सायास अपनी लाचारियों से आक्रमणकारियों के स्वर को तीव्रता और त्वरा देना अपराध नहीं? और......... जिन मित्रों का आपने नाम लिया है, उनके भाव उन्हीं तक महफ़ूज रहें मैं स्वयं को भाग्यशली समझूँगा.
आप भ्रमित नहीं लगे थे कभी. काश आज भी आप किसी वैताली ’वाद’ का शलाका थामे न दीखते. सतत सकारात्मक दिशा की ओर गतिवान हों, इस शुभेच्छा के साथ आपका अग्रज.Friday at 6:56pm via · Like · 1 person
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लक्ष्य ग्रंथों से लक्षण-ग्रन्थ दुरूह होते आये हैं सो कुछ-कुछ यहाँ भी दिखने लगा है | बात मामले को स्पष्टता की ओर ले जाने की हो तो इतना लाक्षणिक-व्यंजक होने के बजाय थोड़ा अभिधात्मक होने की अपेक्षा है...|कुछ वे तत्त्व जो व्यक्ति जीवन की सीमाओं को समाज जीवन से प्रतिबद्ध करते हैं उनमे क्या भाषा को भी रखें...? यदि नहीं....तो....अलम् विवादेन | पुनश्च , यदि हाँ तो कोई तो जगह तो बनानी ही पड़ेगी सम्वाद की...| हिन्दी की दशा के सापेक्ष भइया अमरेन्द्र जी आपका तेवर (किम्वा पीड़ा) मुनासिब है , पर थू-थू करने से गन्दगी भागती नहीं अपितु हमारी जुगुप्सा भर ही प्रकट होती है स्वच्छता की लड़ाई बाकी ही रहती है | अपनी बात को फिर उसी सिरे से पकड़ता हूँ कि जीवन और कथन के बीच जो फांक है उसके मिटे बिना साहित्य के नाम पर जो आएगा..कचरा ही होगा...| इस बात पर आप क्या कहेंगे कि' हर भाषा एक जिन्दगी है........' तो भाषा पर बात करते हुए उस जिन्दगी का भी ख़याल करना होगा जहाँ से भाषा सृजित हुई है | प्रत्येक भाषा में उसकी जिन्दगी के बाहर से आने वाली चीजें अपना नाम लेकर आई हैं | साइकिल ,रेडियो ,ट्रेन .कालीन, लालटेन, गमला... ,टिकट तथा ऐसे अन्य शब्द जिन्हें हिन्दी ने अपने में पचाया है... इनमें अधिकाँश हिन्दी-जीवन से बाहर के हैं | आज का जो हिन्दी-जीवन है वह क्या और कैसा है ये समझने का अच्छा स्थान है दिल्ली | उर्दू शाइरी को लें या बँगला कथा-लेखन को ये बात साफ़ हो जायेगी | आज जब बहुसंख्य जन से अपरिचित किसी भाषा-कवि को नोबल के लिए चुना जाता है तो वहाँ कमाल केवल भाषा का नहीं ,वहाँ की जिंदगी का भी होता है | विद्यापति मिथिला मे ही होते हैं और तुलसी अवध में.......हिन्दी का संकट कुछ इसी किस्म का है | दो-तीन बातें अच्छी उभर कर आयी हैं एक तो श्रीमान सौरभ जी की कि.... "क्या कोई जन्तर साहित्य भी होता है ? दूसरी गीता जी की भाषा कि दुरूहता को लेकर...असल में जब हम अपने प्रतिपाद्य को लेकर सहज नही होते तो हमारी भाषा में एक अवांछित व्यूह निर्मित हो जाता है कालिदास को याद करें- श्लिष्टा क्रिया कस्यचिदात्मसंस्था , संक्रातिरन्यस्य विशेषयुक्ता | यस्योभयम साधु स शिक्षकाणाम् धुरिप्रतिष्ठापयितव्य एव ||.......पर अभी माफ करें फिर कभी.....
Friday at 7:38pm · Like
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Saurabh Pandey //आज जब बहुसंख्य जन से अपरिचित किसी भाषा-कवि को नोबल के लिए चुना जाता है तो वहाँ कमाल केवल भाषा का नहीं ,वहाँ की जिंदगी का भी होता है | विद्यापति मिथिला मे ही होते हैं और तुलसी अवध में.......हिन्दी का संकट कुछ इसी किस्म का है | //
इसे हम क्यों न कुछ यों बोलें .. हिन्दी का संकट वस्तुतः इसी किस्म का है...Friday at 7:49pm · Like · 1 person
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पहले इस पर कुछ कह दूं बाकी पर बाद में आता हूं::
@ ``आपकी कुण्ठा कितनी जायज है या उसका होना कितनों को आकर्षित कर कितना ’अभिभूत’ कर सकता है यह अभी विषयान्तर होगा.'' (सौरभ जी की बात)
और...
“कुछ वे तत्त्व जो व्यक्ति जीवन की सीमाओं को समाज जीवन से प्रतिबद्ध करते हैं उनमे क्या भाषा को भी रखें...?” (मराल जी की बात)
--- संभव है ये बाते “...........और अब शोध करते हुये अपना भविष्य चौपट करने के अतिरिक्त हिन्दी से मैंने कुछ नहीं पाया,..........” - कहने से जुड़ी हैं। यह भी लग रहा है कि मेरी देशभाषाओं (अवधी आदि..) की पीड़ा को मेरी व्यक्तिगत पीड़ा या अक्षमता से उपजा हुआ माना आप लोगों ने। क्षमा माँगते हुये कहूंगा कि मैने अपने को उदाहरण के तौर पर रखने का प्रयास किया है, बातों को स्पष्ट करने के लिये, जिसमें “मेरा विशेष” ढूढ़ लेना, उसे कुंठा या जुगुप्सा का व्यक्तिगत-वमन मानना समीचीन नहीं है। सौरभ जी, आपने कहा; “ भाषा रोटी का पर्याय होती तो ’माँ’ नहीं कहलातीं.” इस पर क्या कहूं सिवाय इसके कि हिन्दी को मैने रोटी के लिये ही पढ़ा है, माँ समझ के नहीं। स्पष्ट किया है वहीं लिखते हुये कि “ (हिन्दी) मातृभाषा होती तो भी आत्मतुष्टि का भाव कोई ग्लानि न करता।” - शायद आप लोगों ने इसमें भी व्यक्त किसी “बात” को नहीं समझा। जब मेरी मातृभाषा अवधी है, तो हिन्दी को अपनी माई क्यों मानूं?/! मराल जी ने कहा, ‘थू-थू करने से गन्दगी भागती नहीं अपितु हमारी जुगुप्सा भर ही प्रकट होती है ’ - भाई, देशभाषाओं की माँग को आप व्यक्तिगत जुगुप्सा-वमन समझें, तो क्या कहूं! जहाँ कुछ करने की बात है, “करने” का काम अपनी सीमाओं के साथ कर रहा हूं, बिना किसी लाभ/लोभ के! पर अब और अपने बारे में व्यक्तिगत होकर बात नहीं करना चाहता। क्योंकि उदाहरण रूप में सामान्य को कहने के उद्देश्य से कही बात भी व्यक्ति-विशेष के अनिवार्य अर्थ में मान ली जायेगी, अस्तु स्व-प्रकरण से हट अन्य बातों पर आता हूं कुछ देर में!! सादर..!Friday at 8:54pm · Like · 2 people
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साधुवाद पाण्डेय जी ! कितना कुछ आपने स्पष्ट कर दिया है....अमरेन्द्र भाई मुझे नही लगता कि यकीनन भ्रमित हैं...मुझे उनका स्वर अभी भी एक निहितार्थ भरा सा लग रहा है..या शायद मैं ही न् समझ पा रहा होऊं | बोली और भाषा एक दूसरे के सामने खडी हों ऐसी लड़ाई तो नहीं थी...और बात को इस तरह लेने की जरूरत मैं समझता हूँ कि जब हिन्दी-लेखन समाज को संबोधित करने की जगह वर्ग को संबोधित करने लगा तब से कचरे की मात्रा बढ़ी है |अगर खड़ीबोली गद्य से ही समझना चाहें तो हजारी प्रसाद द्विवेदी ,कुबेर नाथ राय ,विद्या निवास मिश्र ,निर्मल वर्मा ,या फिर कविता में अज्ञेय ,दुष्यंत , साही , सक्सेना और भी नाम हैं मैंने यूँ ही कुछ गिन दिए.........इनको कहाँ रखेंगे ? हिन्दी साहित्य में तत्त्वभूत सामग्री कम होती गयी है ये सही है पर इतनी भी कम नहीं कि उसे अपवाद की श्रेणी में धकेलकर परिगणन से बाहर कर दिया जा सके | एक बात सम्प्रेषण की चली है तो सम्प्रेषण चिन्मय होता है मेरी समझ में जो शब्द नही भाव का का अपेक्षित है | क्या बुद्ध की पालि ,कबीर की खिचडी , और खुसरो की हिन्दी का कोई कोष बन चूका था उनके पहले ? यदि नहीं तो घर-घर से घाट-घाट तक कबीर की पहुँच का क्या भेद है , और मेरी जन्मभूमि(जनपद गोंडा की एक ग्राम पंचायत ) जैसी असाहित्यिक जगह में अमीर खुसरो की मुकरियाँ मैंने घर के अपढ़ बुजुर्गों से सुनी हैं--एक थाल मोती से भरा....या ..सारी रैन मोरे संग जागा..का सम्प्रेषण कैसे हुआ | क्या हंसना-रोना भी किसी भाषा-बोली के अधीन है ? जो कविता अपनी भावमयता में हँसने-रोने की सी सहजता में उतर सकी है उसे सम्प्रेषण का संकट नही होता....यहाँ थोड़ी सी बात मैं अपनी कर दूँ ..मैंने कोई भाषा इरादतन सीखी हो ऐसा लगभग नहीं है | हिन्दी प्रदेश में जन्मा हूँ ,संस्कृत का नालायक छात्र रहा हूँ पर बँगला रचनाएं कम समझते हुए भी आस्वाद के लिए पढता हूँ, राजस्थानी गीत बहुत प्रिय हैं , गीत गोविन्दम गान बहुत खोजकर लाया हूँ औ सुनता हूँ अवधी, भोजपुरी, मैथिली , मगही सबका कुछ-कुछ साहित्य-संगीत जुटा रखा है ये सब भाषा-बोध से नही भाव-बोध से हो पा रहा है , जो कृती अपने समय-समाज की अनुभूतियों का साझा कर सकेगा उसे संप्रेषणीयता का संकट न होगा | ................................................................... औ भैया अमरेन्द्र जी ! आप का काव कही ऊ मियाँ जायसी का कहि गे है -......भाषा जेती आहिं| सब मंह मारग प्रेम कर.......
Friday at 8:55pm · Like
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Amrendra Nath Tripathi Mahesh Mishra Maral जी मेरे और आपके कमेंट पेस्टित होने में सेकेंडों की ही हेराफेरी रही, कृपया उसे देख लेवें, बाकी का उत्तर देने मैं खाना खाकर आता हूं, ....सादर..!
Friday at 8:57pm · Like
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अब कुछ और बातें कहूं, लिंक दिया था मैने शायद आप लोगों ने जहमत नहीं उठायी और मेरी बातों को “भटके युवा की कुठा” मानकर किनरिया दिया सो कह रहा, वही से लाकर!.. आप बरास्ते हिन्दी के देश-भाषाओं के उद्धार की बात कर रहे हैं, पर आर्य इसे हम छलावा के अतिरिक्त क्या मानें। क्योंकि
-१-पराधीन भारत के कई वर्ष और स्वाधीन भारत के ६० से अधिक वर्ष लिटमस टेस्ट की तरह हैं।
-२-आलोचक धर्मवीर की पुस्तक ’हिन्दी की आत्मा’ के मुद्दे पर यथास्थितिवादी हिन्दी के विद्वानों को साँप सूँघे है।
-३-बोलियों की माँग (भाषा के रूप में) करने वाले राहुल जी जैसे विद्वानों को हिन्दी ने प्रतिगामी सोच का कहकर हाशिये में डाला।
-४-खड़ी बोली का ऐरा-गैरा-नत्थू-खैरा कोई भी ध्यानाकर्षण का हेतु बन जाता है, जबकि बोलियों के यशस्वी कृतिकार सायास उपेक्षित होते हैं।
-५-विगत १०० वर्षों से हिन्दी ने जाने कितनों को उनकी मादरे-जुबान से काटा है, आगे ऐसा न हो इसलिये हिन्दी पर न भरोसा करना ही मुफीद है।
-७-जब हिन्दी बढ़ी तो भी मध्यवर्ग के स्वार्थ बढ़ रहे थे, आज वह मध्यवर्ग अंग्रेजी की ओर क्लिक कर रहा है, स्वार्थ को लेकर, इसलिये उसे चिन्ता लोक-भाषाओं की क्यों हो भला।
-८-हिन्दी को सम्पर्क भाषा के तौर पर बोलीबुड ने बढ़ाया है, न कि विश्वविद्यालय के मठाधीसों ने, और साहित्यकारों ने। सो आगे भी इन मठाधीसों/साहित्यकारों से कुछ नहीं होने का।
-९-मैथिली को भी हिन्दी की बोलियाँ कहा जाता रहा है, पर उसने हिन्दी का मुँह नहीं जोहा और आज वह अवधी-भोजपुरी-ब्रजी आदि से काफ़ी बेहतर स्थिति में है। मैथिली प्रेरक है, न कि हिन्दी।
-१०-भोजपुरी ने इधर अपने को समृद्धतर रूप में पेश किया है, चैनल आये, फ़िल्में आ रही हैं, अन्य देश भाषाओं के लिये यही माडल सही होगा, हिन्दी यहाँ भी प्रेरक नहीं। भोजपुरी पर अश्लील शुरुआत का आरोप है, पर शुरुआत में कुछ खोट रहती ही है, संस्कारित होना तो परवर्ती क्रिया है ही।
-११- लोक भाषाओं को जो सुविधा हिन्दी ने सैंकड़ों वर्षों से नहीं दिया-जनवादियों के जन-नाद धिक्कार है- वह सुविधा इस तथाकथित पूँजीवादी व्यवस्था की नवीन तकनीकी ने दी। कम से कम कोई अपनी मातृभाषा में लिख छाप सकता है, नहीं तो हंस जैसी बहुतेरी पत्रिकाओं में लोक भाषा के लिये ५ वर्ष पूर्व मै एक पृष्ठ माँग कर हार चुका, पर मिला नहीं , कितना बरास्ते हिन्दी सोचूँ, यह चरित्र है हिन्दी का।
किं बहुना? सो मुझे बरास्ते हिन्दी लोकभाषा के उद्धार की बातें छलावा ही लगती हैं। सादर..।Friday at 9:26pm · Like · 2 people
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Amrendra Nath Tripathi आगे रवि और दीपांकर जी से भी अनुरोध है कि तार्किक रूप से अपनी बातें रखें, इससे मेरे व्यक्तिगत-वमित होने की संभावनाएँ सर्वाधिक क्षीण रहेंगी! सादर..!
Friday at 9:28pm · Like · 2 people
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Amrendra Nath Tripathi मराल जी, मैंने बातों को बिन्दुवार लिख रखा है, जिससे आपकी शिकायत (बात मामले को स्पष्टता की ओर ले जाने की हो तो इतना लाक्षणिक-व्यंजक होने के बजाय थोड़ा अभिधात्मक होने की अपेक्षा है..) कम-से-कम मुझसे न रह जाए। वैसे तो मै बात स्पष्ट ही करता आया हूं, संभव है संप्रेषित नहीं हो सका होऊं!!
Friday at 9:45pm · Like
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@ एक सादर अनुरोध है कि आप यह तो कत्तई न करें कि तमिल के नाम पर मची उस ’नाडु’ की निरर्थक सी चिल्ल-पों के सुर में अपनी सार्थक ऊर्जा को जाया करें.
--- सौरभ जी, वह ‘नाडु’ हो या महाराष्ट्र का ‘राष्ट्र’, इसने अपनी सांस्कृतिक माँग को रखा है, इससे भारतीय संघवाद में अनास्था कहाँ से खोजी जाय भला। ऐसा क्यों माना जाय। मैं जब अवधी को देशभाषा कहता हूं तो उसमें लगा ‘देश’ शब्द भी भारतीय संघवाद का विरोधी नहीं है। उल्टे घटिया राष्ट्रवादी मनो-विज्ञान सांस्कृतिक क्षरण अवश्य करता है। पूरा भारत तो सांस्कृतिक तौर पर अनेक एकीकारक तत्वों से पूर्ण है, इसके लिये देषभाषाओं की स्वायत्तता को बाधक नहीं बल्कि साधक माना जाना चाहिये।
Friday at 9:57pm · Like · 2 people
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Amrendra Nath Tripathi Girijesh Rao जी आप गीता जी के प्रश्नों का उत्तर देकर मुझपर उपकार करेंगे, या मान लूं कि आप मेरा ज्ञानवर्धन नहीं करेंगे, कृपया स्पष्ट उत्तर दें, हाँ या न में! सादर..!
Friday at 10:05pm · Like
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Amrendra Nath Tripathi Dipankar jee , आपकी बात रह गयी थी, यही कहूंगा कि जो सच लग रहा है वही बोलना चाह रहा हूं, बोल रहा हूं। यह अगर किसी को बुरा लगे और मेरी “अकादमिक संभावनाएँ” गरहित कर दे तो यह उस महाशय की धूर्त सदाशयता होगी। प्रेमचंद ने कहा है, “बिगाड़ के डर से क्या सच न बोलें!”
Friday at 10:36pm · Like · 2 people
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अमरेन्द्र जी ने अपनी बात बहुत दमदार तरीके से रखी है ,उनको धन्यवाद देता हूँ .अमरेन्द्र जी यदि अपनी मादरी जुबान को मादरी जुबान कह रहे हैं तो किसी कुंठा के शिकार नहीं बल्कि हिंदी क्षेत्र के पाखंडी ,सामंती विचारों से ग्रस्त बुद्धिजीविओं में गायब हो चुके नैतिक साहस को पुनर्जीवित कर रहे हैं .हिंदी के प्रति सिर्फ भावुकता भरे उदघोष करके छुट्टी पा लेने की वजह से हीं उसकी गिरती अवस्था का व्यापक संज्ञान तक नहीं लिया जा रहा है .पाण्डेय जी मानते हैं कि "बोलियाँ भाषा को मजबूत करती हैं ".ये कोई अचरज कि बात नहीं है ,बल्कि इसे एक तथ्य के रूप में हिंदी के छात्रों के comman sense का हिस्सा बना दिया गया है .समय बीतने के साथ यह मजबूत ही हुआ है.इस लिए अमरेन्द्र जी जैसे तमाम लोग अभी कुछ वर्षों तक कुंठा ग्रस्त घोषित किये जाते रहेंगे. इस कड़ी में अमरेन्द्र जी कोई पहले ब्यक्ति नही हैं यह कुंठा इनसे पहले शिवदान सिंह चौहान को भी हो चुकी है क्यों कि उन्होंने एक किताब लिखने कि गलती कर दी थी जिसका शीर्षक था "हिंदी के अस्सी वर्ष ".अगर हिंदी के भाषा के रूप में विकास को समझना हो तो कृपया इस पुस्तक को एक बार पढ़ ले ,बहुत बातें स्वतः साफ़ हो जाएंगी ...
जारी........Friday at 10:39pm · Like · 2 people
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हिंदी के विरोधी के नाम पे अभी देश द्रोही नही कहा गया लेकिन अमरेन्द्र जी को इसके लिए तैयार रहना पड़ेगा .अपनी पिछली बात पे लौटता हूँ बोलियों के सन्दर्भ में ..बोलियाँ भाषा को उर्जा देती है तो फिर क्यों कर बोलियों को छोड़ कर के संस्कृत का दामन थाम लिया गया. कहना यह चाहता हूँ की बोलियों का राग अलापने के लिए अलापा जाता रहा है ताकि इन बोलियों के बोलने वालों के बीच हिंदी की स्वीकृति पैदा की जा सके .संस्कृत कोई बोली तो थी नही तो श्रेष्ठ सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने के नाम पर हिंदी के उपर थोप दिया गया .संस्कृत को हिंदी में घोल देने का काम हिंदी आन्दोलनकारियों की कोई मौलिक खोज नही थी .यह काम हिंदी वालों से पहले बंगला में राजा राम मोहन राय,विद्यासागर ,बंकिम चन्द्र कर चुके थे और जाहिर है इस से जो नुकसान बंगला का होना चाहिए था साफ तौर पर हुआ भी .बंगला जो जन भाषा थी उन्नीसवीं शताब्दी में संस्कृत के घाल मेल से अभिजन भाषा बना दी गयी .इसके पीछे के कारणों का पता लगाने का प्रयास करने पर पता चलता है कि राजा राम मोहन राय जैसे विद्वान लोगों की शिक्षा औपनिवेशिक काल के पूर्व भारत में विद्यमान शिक्षा प्रणाली में हुई थी .इस प्रणाली में संस्कृत,अरबी, फारसी भाषाएँ शिक्षा का माध्यम थीं.बंगला लिखते वक़्त संस्कृत का सुविधा जनक चुनाव कर लिया गया और तथाकथित विदेशी भाषाओं को छोड़ दिया गया .हिंदी के पिछलग्गू आन्दोलनकारियों ने बंगला भाषा के इसी मॉडल को अपना लिया .कहने को भारतेंदु जी हिंदी [भारतेंदु जी स्ववं इसे तब तक "नई भाषा "कहते थे]को बोलचाल की भाषा के करीब लाने की वकालत करते थे लेकिन हिंदी में कविता के क्षेत्र में छायावाद जैसा काव्य आन्दोलन चला जिसकी भाषा कृत्रिम भाषा थी .इस में कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए लेकिन हिंदी की परम्परा से अनभिज्ञ लोगों को आश्चर्य होता है.उन्नीसवीं शताब्दी के हिंदी के विकास से पता चलता है की किस प्रकार से हिंदी को गढ़ा गया.छायावादियों की कृत्रिमता हिंदी की प्रकृति से बिलकुल संगत बैठती थी .सैमुअल हेनरी केलाग[१८७६] हिंदी का व्याकरण तो लिख् मारेलेकिन हिंदी खड़ी बोली नाम कि कोई बोली नही खोज पाए और मजबूर होकर उनको कहना पड़ा कि जो बोली इस क्षेत में समझी जाती है उसका कोई अपना क्षेत्र नही है .ग्रियर्सन साहिब[१८८९] तो कहते ही थे कि हिंदी किसी कि मादरी जुबान नहीं है और इसी वजह से गद्य और पद्य कि भाषा में फर्क पैदा हुआ .भारतेंदु जी के काल में कविता कि भाषा ब्रज बनी रही ,गढ़ने कि प्रक्रिया जारी थी और छायावाद में पूरी हो गयी [कृपया केलाग और ग्रियर्सन के विचारों को साम्राज्यवादियों के विचार कह करके ख़ारिज करने कि भूल न की जाये क्यों की अभी तक यही किया जाता रहा है ,इस सन्दर्भ में कुछ "कुंठा ग्रस्त" भारतीयों का भी उल्लेख कर सकता हूँ लेकिन अभी नहीं करूँगा ]. इनमे से कोई बात मेरी मौलिक उद्भावना नही बल्कि हिंदी भाषा के विकास पर शोध करने वाले विद्वानों ने इस बात को रेखांकित किया है .लेकिन ऐसे विद्वानों को हिंदी में पढने और पढ़ाने की कोई परम्परा नही है.ऐसे विचार अभी अल्पमत में हैं लेकिन ज़रूरी नही की आगे भी ये अल्प मत में रहे हीं .समय करवट लेता है और आगे भी लेगा ही .....
फ़िलहाल समाप्त ..-
Friday at 10:39pm · Like · 4 people
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Mahesh Mishra Maral भाई अमरेन्द्र जी सबसे पहले तो यह कि अगर आपको लगा कि मैंने कोई टिप्पणी व्यक्तिगत होकर की है तो माफी चाहता हूँ...एक स्वस्थ भाषा-विमर्श के अलावा और कुछ नही...लेकिन कुछ लोग आ गए हैं संभव हुआ तो आज नही तो कल अपनी बात निवेदित करूँगा...
Friday at 11:16pm · Like · 2 people
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Ravi जी, आपने तथ्यात्मक और तर्कात्मक पोढ़ाई के साथ बात रखी है, इस हेतु हृदय से आभारी हूं! यह सही कहा आपने कि शिवदान सिंह चौहान भी शिकार हुये, तो भला हम किस खेत की मूली हैं, हमें तो अपने श्रवण-रंध्र को तैय्यार रखना चाहिये कुछ भी सुनने-सहने के लिये! :)
दूसरे कमेंट में आपने संक्षेप में बहत्तर को समेट कर हिन्दी की निर्माण प्रक्रिया और उसके साथ जुड़े हुये संस्कारों को साफगोई से रखा है। उसे हृदयंगम करने के उपरांत शायद लोग देशभाषा की माँग को कुंठात्मक या भावुक-लुंठात्मक न कहें। हमारा तो आग्रह शुरू से संवाद का ही रहा है, लोग हिन्दी के उस गढ़ाव की सांस्कृतिक प्रक्रिया को समझें जिससे जनता से दूरी का स्थायी संस्कार हिन्दी का सहचर बना। जो जनभाषा न हो उसका विस्तार जनता पर थोपा हुआ ही होगा। अब इससे ज्यादा हिन्दी के सायास विस्तार का दूसरा प्रमाण क्या दूं कि जिसे सुदूर दक्षिण पर भी थोपने पहुंचा गया, उन लोगों ने विरोध किया, तो कोई गलत नहीं किया। हिन्दी पट्टी के लोग थोपने वाली मानसिकता से चालित थे, इसलिये ये अपनी अपनी मादरी जुबानों की क्षति राष्ट्रवादी पवित्रता-बोध के साथ करते रहे। जिसने जगाने की कोशिश की उसे गरियाने लगे, याद है अमर नाथ झा ने इलाहाबाद में एक सभा में कह दिया था कि मेरी मातृभाषा मैथिली है तो हिन्दी के फर्जी-सभ्याचारी कैसे पिल पड़े थे! हद थी तब भी और हद है आज भी!
नेपाल में कपिलवस्तु पट्टी में चार-पाँच जिले अवधी के हैं, जहाँ प्राथमिक शिक्षा का माध्यम भी अवधी है। यह अवध में नहीं हो सका, तो....फर्जी बौद्धिकों ने बहुत नुकसान पहुंचाया है, ज्यादा क्या कहें!
पुनः चर्चा को तथ्यात्मक और तर्कात्मक पोढ़ाई के स्तर तक लाने के लिये धन्यवाद! आपने पहली बार आभासी माध्यम पर इस चर्चा में लिखा, और जागरुक और जिम्मेदाराना लिखा, इसलिये ‘आभार’ छोटा रहेगा!Yesterday at 1:13am · Like · 1 person
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Amrendra Nath Tripathi Mahesh Mishra Maral जी, उत्तर देने का नैतिक दाय भी निभाना पड़ता है, उसी को निभाने की कोशिश की, स्वर कहीं तिक्त हुआ हो तो क्षमा चाहूंगा। हाँ, आप भाषा-विमर्श के लिये सादर सदैव आमंत्रित हैं। आप अपनी व्यस्तता से निजात पा अपनी बात/तर्क रखें, स्वागत है! सादर..!
Yesterday at 1:22am · Like · 1 person
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Gita Pandit जी, आपने छायावाद की भाषिक क्लिष्टता को प्रश्नांकित किया, ऊपर रवी जी ने अपनी टीप में इस दृष्टि से छायावाद की क्लिष्टता की सैद्धांतिक समीक्षा की है, उनकी टीप का यह अंश काबिले-गौर है::
“ हिंदी के पिछलग्गू आन्दोलनकारियों ने बंगला भाषा के इसी मॉडल को अपना लिया .कहने को भारतेंदु जी हिंदी [भारतेंदु जी स्ववं इसे तब तक "नई भाषा "कहते थे ]को बोलचाल की भाषा के करीब लाने की वकालत करते थे लेकिन हिंदी में कविता के क्षेत्र में छायावाद जैसा काव्य आन्दोलन चला जिसकी भाषा कृत्रिम भाषा थी .इस में कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए लेकिन हिंदी की परम्परा से अनभिज्ञ लोगों को आश्चर्य होता है.उन्नीसवीं शताब्दी के हिंदी के विकास से पता चलता है की किस प्रकार से हिंदी को गढ़ा गया.छायावादियों की कृत्रिमता हिंदी की प्रकृति से बिलकुल संगत बैठती थी .सैमुअल हेनरी केलाग[१८७६] हिंदी का व्याकरण तो लिख् मारेलेकिन हिंदी खड़ी बोली नाम कि कोई बोली नही खोज पाए और मजबूर होकर उनको कहना पड़ा कि जो बोली इस क्षेत में समझी जाती है उसका कोई अपना क्षेत्र नही है .ग्रियर्सन साहिब[१८८९] तो कहते ही थे कि हिंदी किसी कि मादरी जुबान नहीं है और इसी वजह से गद्य और पद्य कि भाषा में फर्क पैदा हुआ .भारतेंदु जी के काल में कविता कि भाषा ब्रज बनी रही ,गढ़ने कि प्रक्रिया जारी थी और छायावाद में पूरी हो गयी [कृपया केलाग और ग्रियर्सन के विचारों को साम्राज्यवादियों के विचार कह करके ख़ारिज करने कि भूल न की जाये क्यों की अभी तक यही किया जाता रहा है ,इस सन्दर्भ में कुछ "कुंठा ग्रस्त" भारतीयों का भी उल्लेख कर सकता हूँ लेकिन अभी नहीं करूँगा ]. इनमे से कोई बात मेरी मौलिक उद्भावना नही बल्कि हिंदी भाषा के विकास पर शोध करने वाले विद्वानों ने इस बात को रेखांकित किया है .लेकिन ऐसे विद्वानों को हिंदी में पढने और पढ़ाने की कोई परम्परा नही है.ऐसे विचार अभी अल्पमत में हैं लेकिन ज़रूरी नही की आगे भी ये अल्प मत में रहे हीं .समय करवट लेता है और आगे भी लेगा ही .....” !
....................सादर!Yesterday at 1:34am · Unlike · 3 people
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Amrendra Nath Tripathi अरे भाई हम अपनी बात कहे थे और उसके तुरंत बाद सो गये। जाने कहाँ ग़ायब हो गई? हैरान हूँ। लीजिये फिर से (अब इसे फिर से बर्र के छत्ते को छेड़ना न माना जाय)
अधिक न फैलते हुये छायावाद का अर्थ कथित छायावादी त्रिदेवों में से एक'प्रसाद' की व्याख्या से समझा जा सकता है - मोती में आब। आब न हो तो मोती सफेद पत्थर की साधारण गोली जैसी होगी। ऐसे ही कविता में 'छाया' उसे विशिष्ट बनाती है। अब यह छाया अंतर्निहित हो सकती है, किसी पर पड़ सकती है या और आयामों में विचरण कर सकती है। अब यह बताइये क्या यह बात किसी भी कविता पर लागू नहीं होती? फिर कथित छायावादी कविता में ऐसा क्या अलग है जो उसे अलग 'छायावाद' नामधारी खाँचे में रखा जाय? वह कविता अपने निकट पूर्ववर्ती से अलग थी लेकिन उसका नामकरण ग़लत था।
Yesterday at 6:54am · Like
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Amrendra Nath Tripathi गिरिजेश जी, गीता जी का प्रश्न छायावाद की भाषिक क्लिष्टता को केंद्रित करके था, आप अंततः छाया-क्रीड़ा ही करते रहे। प्रभु, जब बात किसी गंभीर विषय को लेकर होने लगे तो वहां “सढ़ुवाइन वाले मजाक” का तुक नहीं होता! सादर..!
23 hours ago · Like
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गीता जी का प्रश्न यह था - छायावादी कविता का क्या...?? इस पर भी प्रकाश पड़े....
उनके प्रश्न में 'भाषिक क्लिष्टता पक्ष' नहीं देख पाया। रही बात गम्भीरता और मजाक की तो मेरी बातों में दोनों हैं। आप देखिये तो सही। यहाँ तक कि नामकरण पर उठाई गई बात भी गम्भीर है। अस्तु...गम्भीर चर्चा में भी थोड़ा ह्यूमर रहना चाहिये नहीं तो चर्चा भी मुक्तिबोध की कविता सी हो जाती है [यहाँ सढ़ुआइन कौन है? ;)] ...क्लिष्टता और सरलता सापेक्ष हैं। हम जैसों की सारी चिंता 'मध्यवर्ग' की चिंता है। होनी भी चाहिये क्यों कि सांस्कृतिक नेतृत्त्व इस वर्ग के पास है और इस वर्ग की जिम्मेदारी दुधारी है - लोक से जुड़े रहने की भी और स्तर को नित बढ़ाते रहने की भी, जिसे साहित्यिक संस्कारीकरण कहा जा सकता है। हिन्दी के मामले में संतुलन बिगड़ गया, तारतम्य टूट गया (बड़ा विषय है।)। उर्दू में फैज़ की रचना 'हम देखेंगे' पर पाकिस्तानी पंजाबी जमात झूमती है, उससे अपने को जोड़ पाती है (उर्दू पंजाबी से बाद में वहाँ आई, या यूँ कहिये आरोपित की गई, फिर भी)। आधुनिक हिन्दी कविता में ऐसा कोई उदाहरण मुझे नज़र नहीं आ रहा। इसका कारण अति बौद्धिकता और वाचिक/गेय परम्पराओं की उपेक्षा भी रही। दोहा, सोरठा जैसे छोटे और जुबान पर चढ़ने वाले पारम्परिक छ्न्दों को छोड़ हमारे महाकवि घनाक्षरी और सवैया में से कौन 'जातीय छ्न्द' हो इस पर बजड़ते रहे और बाद में तो छ्न्द मुक्ति में उन्हें पलायन की एक राह ही मिल गई। लिहाजा हिन्दी कविता जुबान पर चढ़ने से रह गई जब कि द्विपदी शेरो-शायरी का दामन पकड़ उर्दू कविता लोकप्रिय बनी रही। अब इस बात में हिन्दी-उर्दू विवाद की गुंजाइश है लेकिन सचाई भी है... ढेर नहीं लिखूँगा। प्लेटफॉर्म की सीमा है। आप ने कोंच दिया तो बकबका गया नहीं तो चुप ही रहता ...
22 hours ago · Like · 3 people
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Gita Pandit जी, आपने कहा है::
“ जी...भाषा के दुरूहता एक कारण रही है जो हिन्दी का विकास उस स्तर तक नहीं हो पाया जैसा कि होना चाहिए था...साहित्य केवल कोर्स की किताबों तक सिमट कर रह गया ...आज कविता की भाषा रीतिकालीन भाषा हो ही नहीं सकती ..जन मानस तक पँहुचने के लियें क्या आम बोलचाल की भाषा में सहज अभिव्यक्ति की आवश्यकता है...सायास लिखी गयी रचना को कविता का नाम नहीं दिया जा सकता...”
......और,
“छायावादी कविता का क्या...?? इस पर भी प्रकाश पड़े...."
.......साथ ही,
“???? छायावाद नाम नहीं तो क्या नाम है उस काल का...प्लीज़...कहें...ये चर्चा अपने निष्कर्ष पर अवश्य पंहुचाई जानी चाहिए...”
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गीता जी, मित्रवर रवि जी ने हिन्दी की क्लिष्टता के मूल और उसके जन-कटाव पर अपनी ओर से संक्षेप में काफी कुछ कहा है, मैं अब आगे आता हूं;
रीतिकालीन कविता का भी एक बड़ा अंश संस्कृतनिष्ठता से बोझिल है, उदाहरण केशवदास, और जहाँ लक्षण-ग्रंथ-परंपरा निभायी जा रही है, पर व्याकरण तो इसका जनभाषा यानी ब्रज का ही रहा है, और यह शौरसेनी क्षेत्र की जन-भाषा ही रही है। तभी तो केशव कहते थे, “भाषा बोल न जानहीं जिनके कुल के दास/ तिन भाषा रचना करी तिन कुल केशवदास”! सो यह व्याकरण की दृष्टि से जनता से ही जुड़ी रही। वही दूसरे कुछेक रीतिमुक्त कवियों में संस्कृतनिष्ठता से अलग भी चला गया है, यह बात “अति सूधो सनेह को मारग है, जहँ नैकु सयानप बाँक नहीं” की सहजता लिये हुये है। आगे इसी ब्रजभाषा-जनभाषा को सायास रोककर इसपर खड़ी बोली काव्य के व्याकरण को ,जन-कटाव का ध्यान न रखते हुये, हिन्दी के नेताओं ने रख दिया। इसलिये जनता आज तक हिन्दी के उस व्याकरण को पकड़ नहीं पाई। “कुछ” लोगों की सुविधा ने “बहुतों” को साहित्य से दूर रखने का उपक्रम सायास या अनायास कर डाला। आगे स्वाधीनता आंदोलन के ‘हिन्दी-हिन्दू-हिन्दुस्तान’ के घोष ने बाकी का काम पूरा करने में कोई कोर-कसर न लगाई, और स्वाधीनता के बाद हिन्दी राजभाषा बनी, विद्यालयों/विश्वविद्यालयों में आयी, और ये देश भाषाएँ जो जनभाषायें थीं, और जिनका पृथक-पृथक व्याकरण रहा, ये हिन्दी की बोलियाँ और गँवारू बोलियाँ कहकर पददलित कर दी गयीं। अवधी/ब्रज/भोजपुरी/छत्तीसगढ़ी/मगही...आदि आज तक हिन्दी से कहीं अधिक मौलिक और लंबी साहित्यिक परंपरा के साथ दबा दी गयी हैं, जिन्हें आज भी करोड़ों बोल रहे हैं, और कोई गिनती नहीं। जब इन देशभाषाओं की आजादी की बात आती है तो भीरु बुद्धिजीवी तबका पुराना छल फिर शुरू करता है, और कहता है कि संविधान की आठवीं अनुसूची लायक ये भाषायें नहीं है। यही कोई भारतीय सीमा क्षेत्र की जनभाषा होती, जिसकी भाषिक माँ को दबाने पर भारतीय संघवाद को खतरा होता तो अब तक कब का ही आठवीं अनुसूची उसे सादर “भाषा” का दर्जा दे देती। इसलिये अगर अब लगे कि इन भाषाओं में काव्य की संभावना नहीं तो यह गलत है, जबकि उल्टा ज्यादा सही है कि इन भाषाओं के समक्ष हिन्दी की कृत्रिमता के संस्कार से भरी सौ काव्य-यात्रा कहीं नहीं ठहरती।
..............जारी।22 hours ago · Like · 2 people
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पूर्व कमेंट की बात से आगे....
हाँ आज भी इन देशभाषाओं में रचनायें जारी हैं। जो हिन्दी बौद्धिक इस बात को झूठा कहना चाहे उसे किसी भी जनभाषा के एक जिले के गाँवों के लिखैयों के ५० सालों के लेखन को इकट्ठा करना चाहिये, उसका अध्ययन करना चाहिये, फिरलोकभाषा विरोधी फतवे पर विचार करना चाहिये। इस मुगालते में नहीं रहना चाहिये कि गद्य-पद्य दोनों के योग्य लोकभाषायें नहीं, जिस समय अवधी में पढ़ी जी कवितायें कर रहे थे, उसी समय निराला महावीर प्रसाद जी से अवधी में गद्य में संवाद भी कर रहे थे। देखिये ::
http://wp.me/p1CJf5-a
पर निराला जी अवधी में कविता नहीं लिख रहे थे और उधर हिन्दी को जनकटाव वाली संस्कृतनिष्ठता से संस्कारित कर रहे थे, वजह १- हिन्दी-हिन्दू-हिन्दुस्तान की सायास कोशिश, २- ब्रजभाषा(जनभाषा) और उर्दू(अमीर-उमरां की भाषा) दोनों को काव्यभाषा से हटाने की जोर-आजमाइश! [ पंत के ‘परिमल’ की भूमिका देखी जा सकती है] ......ये संदर्भ छायावाद के कवियों के हैं इसलिये इन्हें रखने की कोशिश की मैने, भाषिक क्लिष्टता और जनकटाव को विवेचित करने के लिये।
आगे आपके जो प्रश्न होंगे, उनका स्वागत है! सादर..!
..............फिलहाल समाप्त।22 hours ago · Like · 2 people
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Amrendra Nath Tripathi Mahesh Mishra Maral जी कृपया आप मेरे द्वारा गीता जी को दिये गये उपरोक्त उत्तर-टीप-द्वत को देखें, बात स्प्ष्ट होगी। आप अवधी/ब्रज/भोजपुरी/छत्तीसगढ़ी/मगही ...आदि को हिन्दी की बोलियां नहीं बल्कि स्वतंत्र भाषायें मान विचार करें, ग्रामर के अंतर को ध्यान में रखते हुये! सादर..!
22 hours ago · Like · 1 person
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Girijesh Rao जी, “सढ़ुवाइन से मजाक” का तात्पर्य गंभीर बातों में आपके शुरू के अगम्भीर-छौंक से है, यह अवधी क्षेत्र में तुकहीन अगम्भीरता का वाचक है, संभव हो आपके भोजपुरी क्षेत्र में यह न चलता हो या आप अ-लौकिक हो गये हों!!
@हिन्दी के मामले में संतुलन बिगड़ गया, तारतम्य टूट गया (बड़ा विषय है।)। उर्दू में फैज़ की रचना 'हम देखेंगे' पर पाकिस्तानी पंजाबी जमात झूमती है, उससे अपने को जोड़ पाती है (उर्दू पंजाबी से बाद में वहाँ आई, या यूँ कहिये आरोपित की गई, फिर भी)। आधुनिक हिन्दी कविता में ऐसा कोई उदाहरण मुझे नज़र नहीं आ रहा।
--- असहमत हूं आपसे। यह संतुलन उर्दू के मामले में ज्यादा टूटा। इस्लाम जैसी जबर आइडेंटिटी के बाद भी दो पाकिस्तान में एक अलग देश ही बन गया, बंगला देशभाषा की मांग पर, इसे देखने की कोशिश कीजिये। बाकी पाकिस्तान के एथेनिक आंदोलनों पर एक नजर फिर मारिये, तिब्बत से नाक और सीधी कीजिये।
@दोहा, सोरठा जैसे छोटे और जुबान पर चढ़ने वाले पारम्परिक छ्न्दों को छोड़ हमारे महाकवि घनाक्षरी और सवैया में से कौन 'जातीय छ्न्द' हो इस पर बजड़ते रहे और बाद में तो छ्न्द मुक्ति में उन्हें पलायन की एक राह ही मिल गई।
--- गजब पल्टा लेते रहते हैं भाई आप, छंदमुक्त का गौरवगान अब तक आप करते आये हैं जाइये, देखिये अपनी ही बात को
http://naagaree.blogspot.com/2011/03/blog-post.html
कवि-सुलभ-फिसलन के आप खूब शिकार है, वहां भी मेरा कमेंट देखियेगा!
@ ढेर नहीं लिखूँगा। प्लेटफॉर्म की सीमा है। आप ने कोंच दिया तो बकबका गया नहीं तो चुप ही रहता ...
--- चाहे चुप रहिये या मुखर, आपकी मर्जी। सीमा रेल की लगे या प्लेटफार्म की, आप स्वतंत्र है। और कोंचने की शुरुआत तो आपने ही की थी! :-)22 hours ago · Like
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मराल जी की टिप्पणी का हिस्सा "क्या बुद्ध की पालि ,........सब मंह मारग प्रेम कर" इतना सहज और मातृभाषा और लोकभाषाओं के प्रेम से ओतप्रोत लगा की एकबरगी तो आश्चर्य हुआ की इन्हें अमरेन्द्र जी की टिपण्णी से मतभेद क्यों कर है .फिर दुबारा इनकी टिपण्णी पढने पर एक बात स्पष्ट हुई की जब मै,रवि या अमरेन्द्र भोजपुरी या अवधी की बात कर रहे हैं तो इन्हें स्वतंत्र भाषाएँ मान कर कर रहे हैं ,जबकि मराल जी लोकभाषाओं के प्रति अगाध प्रेम के बावजूद इन्हें हिंदी रुपी भाषा माता की बोली रुपी पुत्रियों से अलग कर के नहीं देख पा रहे हैं.इसमें कुछ अस्वाभाविक भी नहीं है ,क्योंकि मुख्य धारा की हिंदी अकदमिकी और इसके "शास्त्रीय" विद्वान पिछले १०० सालों से यहीं मानते और मनवाते आ रहे हैं .तो अपनी बात की शुरुआत इसी उद्घोषणा के साथ करता हूँ की हिंदी,भोजपुरी ,ब्रजी अदि लोकभाषाएँ हिंदी की बोलियाँ न
होकर स्वतंत्र भाषाएँ हैं .अपनी बात के समर्थन में यथास्थान सैकड़ो प्रमाण दे सकता हूँ ,लेकिन यहाँ यहीं कह दूँ की हिंदी भाषा पर काम करने वाले हर एक भाषाशास्त्रीय(linguistic )विद्वान(यहाँ भाषाशास्त्रीय पर जोर है ,क्यों की हिंदी भाषा और अन्य भाषाओं के बीच संबंधों पर कोई भी काम अनिवार्य रूप से भाषाशास्त्र का विषय है. ) ने इस बात की पुष्टि की है
.चंद नाम हैं -ग्रियर्सन ,केलाग ,सुनीति चटर्जी ,उदय नारायण तिवारी,किशोरी दास वाजपई ,वसुधा डालमियां ,फ्रेंचिसका ओर्सिनी अदि ....सूचि बहुत लम्बी है लेकिन ये सारे लोग हिंदी की मुख्य धारा में हाशिये पर है और इनके लिए जिन विशेषणों का प्रयोग किया जाता रहा है उनका जिक्र नहीं करूँ तो बेहतर !अब आते हैं हिंदी की मुख्य धारा पर.इस सन्दर्भ में सबसे महत्वपूर्ण बात ये है की विश्वविद्यालयों की हिंदी अकादमिकी में भाषाशास्त्र के अध्ययन की किसी सुनियोजित परंपरा की मुझे कोई जानकारी नहीं है.(इसीलिए भाषाशास्त्र सम्बन्धी किसी नयी बात के सामने आने पर हिंदी भाषा के विद्यार्थी को उत्तेजित या भावुक नहीं होना चाहिए क्यों की भाषाशास्त्र सम्बन्धी हमारा ज्ञान प्रारंभिक तौर पर अधकचरा होता है और हिंदी आलोचना की मोटी पोथियाँ लिखने वाले कई विद्वानों की भाषाशास्त्रीय समझ सतही होती है )लेकिन हाँ हिंदी में स्वयंभू भाषाशास्त्रियों की एक परंपरा जरुर दिखती है जीन पर लम्बी बात हो सकती है .
जारी............21 hours ago · Like · 1 person
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अब रवि और अमरेन्द्र जब हिंदी के हवाले से कोई बात कहते हैं तो मन मे उनकी एक हिंदी के आलोचक /दुश्मन की छवि बनाने से पहले यह सोच लेना चाहिए ये लोग किसी तमिल ,भोजपुरी या अवधी के विद्यार्थी /शोधार्थी नहीं हैं.इन्होने अपने पिछले ८-१० वर्ष हिंदी के अध्ययन और मनन में ही लगाये हैं
.और आज जब ये लोग इस किनारे कर दी गयी अवधारणा को नए सिरे से उठा रहे हैं तो ऐसा करने से पहले इन्हें अपने आप से कितना लड़ना पड़ा होगा ये मै समझ सकता हूँ .इनकी दुविधा और मनः संघर्षों को उदय नारायण तिवारी के एक व्यक्तिगत उदहारण से बड़ी सटीक अभिव्यक्ति मिलती है -
" बात सन १९२५ की है .तब मैं प्रयाग विश्वविद्यालय में बी ए प्रथम वर्ष का छात्र था .एक दिन कक्षा में आदरणीय डॉ धीरेन्द्र वर्मा ने हिंदी की सीमा बतलाते हुए कहा -"डॉ ग्रियर्सन के अनुसार भोजपुरी भाषा-क्षेत्र
हिंदी के बाहर पड़ता है ;किन्तु मै ऐसा नहीं मानता."भोजपुरी भाषा भाषी होने के नाते तथा राष्ट्रभाषा हिंदी के प्रति अनन्य स्नेह होने के कारण,डॉ वर्मा के विचार तो मुझे रुचिकर प्रतीत हुए ;परन्तु डॉ ग्रियर्सन की उपर्युक्त स्थापना से ह्रदय बहुत क्षुब्ध हुआ.मैंने यह धारणा बना ली थीकी भोजपुरी हिंदी की हि एक विभाषा है ,अतएवं हिंदी के क्षेत्रों से भोजपुरी को अलग करना मुझे देशद्रोह सा प्रतीत हुआ .मैंने अपने मन में सोचा ,-ग्रियर्सन आइ.सी.एस. था ,फुट डालकर शासन करने वाली जाति का एक अंग था ,समूचे राष्ट्र को एक सूत्र में बांधने में समर्थ हिंदी को अनेक छोटे-छोटे क्षेत्रों में विभाजित करने में उसकी यहीं विभाजक निति अवश्य रही
होगी .उसी समय मेरे मन में संकल्प जागृत हुआ की पढाई समाप्त करने के अनंतर मै एक दिन भोजपुरी के सम्बन्ध में ग्रियर्सन द्वारा फैलाये गए इस भ्रम को अवश्य हीं निराधार सिद्ध करूँगा और सप्रमाण यह दिखा दूंगा की भोजपुरी हिंदी की हीं एक बोली है तथा उसका क्षेत्र हिंदी का हीं क्षेत्र है .परन्तु आज भोजपुरी के अध्ययन में चौबीस वर्षों तक निरंतर लगे रहने तथा भाषाशास्त्र के अधिकारी विद्वानों के संपर्क से भाषा –विज्ञानं के सिधान्तों को यत्किंचित सम्यक रूप में समझ लेने के पश्चात् मुझे अपनेउस पूर्वाग्रह पर खेद होता है ,जो बी ए प्रथम वर्ष में ,भाषा विज्ञानं के गंभीर परिशीलन के बिना हीं मेरे ह्रदय में स्थान पा गया था .आज मुझे डॉ ग्रियर्सन के परिश्रम ,ज्ञान एवं पक्षपात रहित -विवेचना के गौरव का अनुभव होता है और इस विद्वान् के प्रति ह्रदय श्रद्धा से परिपूर्ण हो जाता है;साथ हीं याद आती है -भर्तुहरि की ये पंक्तियाँ -
यदा किंचिज्ज्ञोऽहं द्विप इव मदान्धः समभवम्
तदा सर्वज्ञोऽस्मीत्यभवदवलिपतं मम मनः।
यदा किञ्चित्किाञ्चिद् बुधजनसकाशादवगतम्
तदा मूर्खोऽस्मीति जवन इव मदो में व्यपगतः।।
“जब मुझे कुछ ज्ञान हुआ तो मैं हाथी की तरह मदांध होकर उस पर गर्व करने लगा और अपने को विद्वान समझने लगा पर जब विद्वानों की संगत में बैठा और यथार्थ का ज्ञान हुआ तो वह अहंकार ज्वर की तरह उतर गया तब अनुभव हुआ कि मेरे समान तो कोई मूर्ख ही नहीं है।”
(भोजपुरी भाषा और साहित्य ,लेखक -उदय नारायण तिवारी ,बिहार राष्ट्रभाषा
परिषद-१९५४)"
जारी..............21 hours ago · Like · 1 person
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अब कुछ बातें मोटे संकेतों के तौर पर रख देता हूँ जिनपर आवश्यकतानुसार विस्तृत चर्चा भी कर सकूँगा .
क्या यह strange नहीं लगता कि हिंदी भाषा के इतिहास ग्रंथों में १५ वीं ,१६ वीं और १७ वीं शताब्दियों में अवधी ,भोजपुरी और ब्रजी के कवि ,मसलन जायसी,कबीर ,तुलसी ,सूरदास आदि , प्रतिनिधि कवि के रूप में दिखाए जाते हैं ,वहीँ २० वीं शताब्दी आते आते इन भाषा के कवियों और साहित्यकारों पर एक लाइन भी नहीं खर्च किया गया है .तो क्या इन भाषाओँ में साहित्य रचना बंद हो चुकी थी ?नहीं ,तमाम प्रलोभनों ,सामाजिक दबावों (तथाकथित हिंदी पट्टी की भाषाओँ के तमाम साहित्यकारों के हिंदी में switch over कर जाने की त्रासद गाथा का संकेत भर कर रहा हूँ ,)के बावजूद इन भाषाओँ में रचनाएँ हो रही थीं और होती रहीं .
उत्तर भारत की तमाम भाषाओँ को दबा कर हिदी के अश्वमेध का घोडा आगे बढ़ा और बंगाल पहुँच गया .बंगला भाषा और लिपि के ऊपर हिंदी की श्रेष्ठता के दावे किये जाने लगे .और यह बेशर्म दृष्टता तब की जा रही थी जब की उस वक़्त भी बंगला में शरतचंद्र जैसे उपन्यासकार और टैगोर जैसे कवि लिख रहे थे .भारत भर में नगरी प्रचार सभाएं स्थापित की गयीं और इस प्रक्रिया में सुदूर दक्षिण(तमिल प्रदेश) को भी नहीं छोड़ा गया .इन्ही प्रदेशों में २०००साल पहले तमिल भाषा में संगम साहित्य की रचनाएँ हो रही थीं और उन्ही लोगों से उनकी अपनी भाषाएँ भूल कर नागरी सिखने को कहा जा रहा था .धिक् पाखंड !
वैसे इसका एक रूप तो आज भी दिख जायेगा ,कुछ पूर्वोतर राज्यों के नामकरण में .अरुणाचल प्रदेश और मेघालय! पता नहीं इन प्रदेशों के कितने लोगों को अरुणाचल और मेघालय का अर्थ पता होगा .क्या इन प्रदेशों में अपनी भाषाएँ नहीं हैं ?
अभी हिंदी हिन्दू हिंदुस्तान के नारे ,आर्य समाज की भूमिका और हिंदी उर्दू विवाद के हवाले से बहुत कुछ कहना बाकि है जिन्हें बहस के आगे बढ़ने पर रखने की कोशिश करूँगा .
अंत में कहूँगा की हिंदी के भाषा के रूप में विकास और हिंदी की उसकी तथा कथित बोलियों से संबंधों पर देर सारी सामग्री उपलब्ध है.जिनकी इच्छा हो उनकी यथासंभव मदद करने की कोशिश करूँगा ,क्योंकि अंततः मेरा उद्देश्य एक constructive संवाद स्थापित करना है .मै अपने अनुभव के आधार पर कह सकता हूँ की आज से ५ साल पहले मुझसे कोई ये बात कहता की अवधी /भोजपुरी आदि हिंदी की बोलियाँ नहीं बल्कि स्वतंत्र भाषाएँ है तो मै इसे कोरी बकवास हीं मानता ,लेकिन आज अपने ज्ञान को परिमार्जित और परिशोधित कर के अति संतुष्ट हूँ .हम युवा हैं और हमारे अन्दर पूर्वाग्रहों ने अभी इतनी जड़ नहीं जमाई है की उन्हें खोद कर उखाड़ा न जा सके.
समाप्त21 hours ago · Like · 1 person
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Amrendra Nath Tripathi अक्षरशः सहमत हूं दीपांकर जी आपसे! विस्तृत रूप से आपने काफी कह दिया है।
अब लोगों को चाहिये कि इस सभी बातों पर विचार करते हुये अपनी बातों को रखें। इससे लोकभाषा के पक्ष को समझने में आसानी होगी, और भावुक ढ़ंग से बातों पर नहीं सोचा जायेगा, लेकिन लोगों को इन सारी बातों को चौकस होकर पढ़ना और समझना चाहिये!21 hours ago · Like · 1 person
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भाई अमरेन्द्र जी और दीपांकर जी की बातचीत पढकर आनन्द मिला। ये गम्भीर विषय है।आप लोगों के विचार भी साफ हैं,मुझे लगता है कि हिन्दी का चरित्र सत्ता की भाषा जैसा हो गया है।जैसा किसी समय संस्कृत,अंग्रेजी और उर्दू का हुआ होगा किंतु अवधी,बृज,बुन्देली आदि लगभग सत्ता हीन भाषाएँ बनी रहीं इसी लिए इन भाषाओं में संवेदना की सुगन्ध मिलती है।सत्ता की भाषा धीरे धीरे संवेदना शून्यता की ओर ले जाती है।रचनात्मकता की सर्वाधिक संभावना इन्ही सत्ताहीन जनभाषाओं में आज भी विद्यमान है।यहाँ रचनाकार पुरस्कार आदि के लिए छपकर अकादमिक आदि होने के लिए भी नही लिखता।वह अपने लोक जीवन के लिए लिखता है।वह अपने लोक जीवन की वैचारिक सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को सुदृढ करने के लिए लिखता है। हिन्दी में रचनात्मकता पर खरपतवार अधिक आ गया है॥
21 hours ago · Like · 3 people
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Amrendra Nath Tripathi Saurabh Pandey ji, Mahesh Mishra Maral ji, आप दोनों सहृदयों से सादर निवेदन है कि उपर आये अनेक तर्कपूर्ण और तथ्यपूर्ण कमेंटों(विशेष कर रवि, दीपांकर आदि के...) को बुद्धि-निकष पर कस कर अपने सवाल, सहमति/असहमति से अवगत करायें, ताकि चर्चा जारी रहे! सादर..!
18 hours ago · Like
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भैया अमरेन्द्र जी ! हम सोच तो रहे थे कि उपराम हों इस चर्चा से लेकिन आपके आदेश और दीपांकर भाई के एक आश्चर्य के मद्देनजर कुछ अर्ज है...
यह सफाई नहीं है...मेरी मातृभाषा अवधी है..मुझे भोजपुरी बहुत प्रिय है और वो तमाम देश-भाषाएँ जिन्हें कुछ कम बूझ पाता हूँ उनसे भी लगाव है..भाई अमरेन्द्र जी से तो सम्पर्क ही इसी लोभ से हुआ कि आपके स्टेटस पर अवधी दिखी...दीपांकर जी को जाने क्यों लगा कि मेरा मतभेद है आपसे....हाँ उतना पढ़ा-लिखा नही हूँ ना तो लाचार हूँ...रही शास्त्रीय और अकादमिक होने की बात... तो राम कहिये , यहाँ ये जरूर बता दूँ कि मैं बोलियों को भाषा की बेटी पतोहू आदि नही समझता...समझ भी नही सकता क्योंकि भाषाएँ बोलियों को नहीं अपितु बोलियां भाषाओं को जन्म देती हैं मेरी समझ में...किसी प्रतिवाद के लिए मैं चर्चा में शामिल नही हुआ...एक टिप्पणी " हिन्दी में (अपवाद को छोड़कर) कवि के पाठकों का दायरा बढ़ने के साथ उनका काव्य-पदार्थ घटने लगता है! इस राजभाषा के साहित्य में कचड़े की भारी मात्रा त्रासद है|" पढकर लगा ये कि बात अनुपेक्षणीय है तो कुछ-कुछ कहा...मैं किसी बड़ी रेखा को छोटी करने के लिए उसे काटने के बजाय दूसरा विकल्प चुनने का हामी हूँ.....
मैथिली,भोजपुरी हिन्दी को निशाना बना कर नही बड़ी हुईं...जरूरत अपना काम करने की है..
बचपन से मैंने भी जो सीखा वो अधिकांश अवधी था....इन सब के बावजूद कुछ निवेदन है इसे तर्क के बजाय जिज्ञासा के रूप में लेने की कृपा करें
- अंचलों से ऊपर जो समाज है उसके परस्पर संवाद की भाषा क्या
हो ?
- बात राष्ट्र की होने पर भाषा का मानक रूप क्या हो ?
- आंचलिक भाषाओं के रूप में भोजपुरी और अवधी ही क्यों मगही,
बज्जिका, बघेली , बुन्देलखंडी व अन्य और फिर इनके अंतर्वर्ती भेद-
कासिका, अंगिका ,बैसवारी आदि सब के स्वायत्त होने की स्थिति में क्या
समाज-संरचना भाषिक आधारों पर हो ?
- क्या कोई राष्ट्रीय चिन्ता इन्ही भाषाओं में व्यक्त हो ? यदि हाँ तो फिर
सभी भाषाएँ क्या अंचलों को संबोधित करेंगी ?
कोई आग्रह नहीं , बस बात आदमी से आदमी के जुड़े रहने में यदि भाषा की भी कोई भूमिका हूँ तो वह कैसे तय हो ? ये जानना चाहता हूँ.... साहित्यिक उत्थान हो देश-भाषाओँ का.... ठीक है पर एक संवाद-भाषा राष्ट्र की हो तो कौन सी हो ?16 hours ago · Like
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Mahesh Mishra Maral जी, शुक्रिया आगमन हेतु। प्रश्न रखने हेतु! अब आपके सवालों पर आता हूं::
यह सत्य है कि स्टैटस की बहस जो थी उसका स्वरूप हट कर था लेकिन अब जो नया स्वरूप है वह उसी से जुड़ा है और सार्थकता लिये हुये है, इसलिये इसे जारी रहने में ठीक लग रहा है। दूसरी बात है कि जब एक रेखा दूसरी पर लदी हो और उपेक्षित किये हो, तो दूसरी से निजात पा ही पहलकी अपना सर्वांगी/संपूर्ण विकास कर सकेगी। पहले तो इस देशभाषाओं को इनके पहिलकी रेखा(हिन्दी) के जबरिया अंतर्भुक्त(बोली) रूप से आजादी तो दी जाय, बाकी काम इन लोकभाषाओं के ऊर्जा-स्फूर्त कंठ स्वतः कर ही देंगे। इसके बाद हमारी दुश्मनी किसी हिन्दी से नहीं है, अवधी/ब्रजी/भोजपुरी..आदि आदि भाषाओं का ओहदा और रुतबा वही है जो तमाम नव्य भारतीय आर्य भाषा मैथिली, बंगला, असमिया, उड़िया आदि का है, पहले हिन्दी की बोलियाँ से अलग इन्हें नव्य भारतीय आर्य भाषा यह पहचान संविधान-दत्त अधिकार तो मिले। रेखा छोड़े तो दूसरी(बहुतेरी) रेखाओं को, काम का जलवा फिर देखिये।
..........जारी।15 hours ago · Like · 1 person
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पिछले कमेंट से जारी...
@अंचलों से ऊपर जो समाज है उसके परस्पर संवाद की भाषा क्या हो ?
--- संवाद की भाषा के लिये इन आंचलिक भाषाओं की अवहेलना क्यों हो, संवाद का तर्क और बड़ा होकर अंग्रेजी का दामन थामेगा, जिसमें अनुचित कुछ नहीं, साउथ इंडिया भी भार...See More
15 hours ago · Like · 1 person
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rashtra ki ek samvad bhasha kya ho? >> to yahi kahna hai ki bharat jaise vividhta wale desh me ek samvad bhasha banane ke pahle Hitlar ko bhi sochna padega ,aur loktantra me to iski kalpna bhi nahi ki ja sakti.
aur..
aur jab aadhunik rashtra ki sankalpana nahi thi to kya Bharat ke alag -alag bhag ke logon ke bich samvad nahi hota tha?kabir aur tulsi kaise ghar ghar me pahunch gaye?tamil pradesh ka aadmi kaise banaras aur gaya me aa kar tirath kartaa tha?
............jaaree!14 hours ago · Like
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जारी के आगे...
@आंचलिक भाषाओं के रूप में भोजपुरी और अवधी ही क्यों मगही, बज्जिका, बघेली , बुन्देलखंडी व अन्य और फिर इनके अंतर्वर्ती भेद-कासिका, अंगिका ,बैसवारी आदि सब के स्वायत्त होने की स्थिति में क्या समाज-संरचना भाषिक आधारों पर हो ?
--- सुहृद मराल जी, हम तो हिन्दी के अंतर्गत परिगणित उन सभी तथाकथित बोलियों की बात करते हैं, उनकी आजादी की बात, जब हम अवधी/भोजपुरी कहते हैं तो उदाहरण के रूप में कह रहे होने हैं, पीड़ा तो सभी की है, और किसी की भी उपेक्षा नहीं की जा सकती। हम इसको बखूबी व्यक्त करते आये हैं, उपर की मेरी बातों को चौकस होकर आपको पढ़ना था, जहाँ मैने कई बार कहा है, स्पष्ट रूप में, “ अवधी/ब्रज/भोजपुरी/छत्तीसगढ़ी/मगही...आदि आज तक हिन्दी से कहीं अधिक मौलिक और लंबी साहित्यिक परंपरा के साथ दबा दी गयी हैं, जिन्हें आज भी करोड़ों बोल रहे हैं, और कोई गिनती नहीं।” .......क्लीयर तो है न, ‘आदि’ शब्द तो ध्यान में लाना था प्रभु। ....आपको भी मेरी इंगिति थी, पुनः रख रहा, “ Mahesh Mishra Maral जी कृपया आप मेरे द्वारा गीता जी को दिये गये उपरोक्त उत्तर-टीप-द्वत को देखें, बात स्प्ष्ट होगी। आप अवधी/ब्रज/भोजपुरी/छत्तीसगढ़ी/मगही ...आदि को हिन्दी की बोलियां नहीं बल्कि स्वतंत्र भाषायें मान विचार करें, ग्रामर के अंतर को ध्यान में रखते हुये!”
.................जारी।14 hours ago · Like · 1 person
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जारी से आगे.....
@........इनके अंतर्वर्ती भेद-कासिका, अंगिका ,बैसवारी आदि सब के स्वायत्त होने की स्थिति में क्या समाज-संरचना भाषिक आधारों पर हो ?
--- इस तरफ भाषा-शास्त्रीय दृष्टि रखनी होगी। देशभाषाओं के अंतर्वर्ती भेद उस देशभाषा के व्याकरण के भीतर ही लहजे के भेद हैं। यह लहजे के भेद आपको अन्य नव्य भारतीय आर्य भाषा मराठी, बंगला ...सभी में मिलेगा। इससे भाषा अलग नहीं साबित होती। हम हिन्दी जैसे मानकीकरण के विरोधी हैं, इसलिये इन अंतर्वर्ती भेदों की खूबसूरती और सहजता के साथ भाषा से बाहर नहीं रखते, व्याकरण एक है। कासिका उसी तरह भोजपुरी का लहजा है जिस तरह बैसवाड़ी अवधी का। इसी तरह अन्य देश भाषाओं में भी है। इसमें कोई दिक्कत नहीं, ऐसा भाषाभास्त्रीय विद्वानों ने स्पष्ट रूप में कहा है।
...........जारी।14 hours ago · Like · 1 person
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जारी से आगे......
॥ रोमन में हुये कमेंट का देवनागरी में अनुवाद और थोड़ा और बातें के साथ भी ॥
____ मराल जी, राष्ट्र की एक संवाद भाषा क्या हो?? >> भारत जैसे विविधता वाले देश में एक संवाद भाषा “बनाने” के पहले हिटलर को भी सोचना पड़ेगा और लोकतंत्र में इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। सहज प्रक्रिया में बनना दूसरी बात है, हिन्दी “बनायी” जाती रही, इसके प्रमाण ऊपर बहुत से दिये जा चुके हैं। जब आधुनिक राष्ट्र की संकल्पना नहीं थी तब क्या भारत के अलग अलग भाग के लोगों के बीच संवाद नहीं होता था? कबीर और तुलसी कैसे घर घर पहुंच गये? तमिल प्रदेश का आदमी कैसे बनारस और गया आ कर तीरथ करता था?
भाषा को राष्ट्र के एकता के तत्वों में शामिल करना राष्ट्र राज्य के दौर की एक पश्चिमी अवधारना थी (जो अब वहां भी ख़त्म हो चुकी है )जो अंग्रेजों के माध्यम से यहाँ तक आई और यहाँ आने पर उन्हें सबसे आश्चर्य यहीं हुआ की यहाँ के लोगों की तो कोई एक भाषा ही नहीं है .इसी को दुरुस्त करने के लिए ही तो गिलक्रिस्ट साहब [ १८०० ई.] बैठे और हिंदी का ये सारा बखेड़ा शुरू हुआ.आगे तो आप जानते ही हैं । सादर..!
.............फिलहाल समाप्त॥14 hours ago · Like · 1 person
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Amrendra Nath Tripathi Mahesh Mishra Maral जी, आपके प्रश्नों के उत्तर सादर निवेदित हो चुके हैं, और भी जो लोग प्रश्न-कामी हों, उनका सादर स्वागत है, संवाद हर स्थिति में अपेक्षित है। मराल जी, आपके अग्रिम प्रश्नों/जिज्ञासाओं/असहमतियों सभी का स्वागत है। सादर..!
14 hours ago · Like · 1 person
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हमको हिंदी जैसा मानकीकृत और "वैज्ञानिक" व्याकरण नहीं बनाना है ,क्यों की हिंदी का व्याकरण drawing rooms में बैठ कर लिखा गया है ना की पाणिनि और पश्चिम के विद्वानों की तरह लोगों के बीच जा कर और उन्हें बोलते हुए सुन कर .क्यों ? क्योंकि ,हिंदी का कोई नेटिव स्पीकर नहीं था और विद्वानों ने इस कारण इसे यांत्रिक (और वैज्ञानिक भी ) बनाने में कोई कसार नहीं छोड़ी.हमारी लोकभाषाओं को तो करोडो लोग बोलते हैं और उनकी पुस्तकें तैयार करते वक्त उनके अन्दर की विविधताओं का सम्मान तो अनिवार्य होगा.
14 hours ago · Like · 2 people
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Amrendra Nath Tripathi मराल जी, ऊपर दीपांकर जी का कमेंट भी आपके प्रश्नों के मद्देनजर धयातव्य है!
14 hours ago · Like
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बात हिन्दी के काव्य और काव्य पदार्थ की थी जो अब भाषा के स्वरूप और विकास/सृजन तक पहुँची। विमर्श और डिबेट/शास्त्रार्थ में अंतर होता है। शास्त्रार्थ में स्वयं को विजयी बनाना लक्ष्य होता है - युद्ध की तरह। अपने शर संधान करते जाइये। दूसरों की बात का स्वीकार भी हमले को तेज करने के लिये किया जाता है, सोच या परिस्थिति में सार्थक परिवर्तन के लिये नहीं। जो प्रश्न आप ने उठाया उसकी प्रवृत्ति भी यही है। ह्यूमर को सढ़ुआइन मजाक से जोड़ना और हर बात का प्रत्युत्तर देना भी वही है। मैंने समझा था कि यह वाद विवाद नहीं, एक छटपटाहट है - घुटन से बाहर आने की। खैर... आप ने ध्यान नहीं दिया कि मैंने लोक से जुड़ने और स्तर को दिनों दिन ऊँचा उठाने की दुधारी जिम्मेदारी की बात की थी और हिन्दी के केस में तारतम्य टूटने और संतुलन खोने की बात की थी। एथनिक आन्दोलनों का मुद्दा बहुत व्यापक है, उसे इतनी संकीर्ण दृष्टि से देखना ठीक नहीं। बात बस इतनी है कि विकसित या आरोपित भाषा भी पूर्ववर्ती की शत्रु नहीं हो जाती बशर्ते लोक से जुड़ी रहे। हिन्दी में लोकभाषाओं से जुड़ाव था और रहेगा। गड़बड़ वहाँ हुई कि बौद्धिकता के आग्रहों में जटिल टाइप की कविताई ही होती रही। उस तरह की कविताई आवश्यक है, संसार की हर वर्तमान समृद्ध भाषा में फ्री वर्स और जटिल भावबोधों वाली कवितायें हैं क्यों कि वे नेतृत्त्व (भारत के केस में मध्य वर्ग) की कवितायें हैं। रहेंगी ही। जब मैंने उर्दू कविता का एक उदाहरण दिया तो यही कहना चाहा कि एक पंजाबी उर्दू को स्वीकार सकता है, उससे जुड़ भी सकता है(पंजाबी को सीने से लगाये रख कर भी) क्यों कि उसमें उसकी समझ आने वाले ढंग से उसकी बात कही गयी है। दूसरी भाषाओं के कवियों में बौद्धिकता भरी जटिल कवितायें हैं लेकिन वे ऐसा भी रचते रहे जो सीधे जन समुदाय से जुड़ता रहा।मराठी में ग. दि. माडगूळकरांनी ने आधुनिक काल में 'गीत रामायण' रची जो आम और विशिष्ट दोनों के कंठ और मन का हार हुई। निराला की 'वर दे' धार्मिक सांस्कृतिक कारणों से आम लोगों से जुड़ी लेकिन तमाम विशेषताओं के बावजूद 'सरोज स्मृति' नहीं। यहीं वाचिक/गायन/फोक परम्परा सामने आती है। सरोज स्मृति के शब्द/ विन्यास कुछेक स्थलों को छोड़ लोक के गायन लायक नहीं। वे स्थल भी संस्कारित जन की ही जुबान पर चढ़ेंगे बशर्ते वह पढ़े या पढ़ पाये।
छ्न्द के विषय पर भी आप ने शर सन्धान ही किया। मुक्त छ्न्द होंगे ही लेकिन वे आम जन कंठहार नहीं बन सकते। मात्र इसके लिये वे त्याज्य नहीं कि वे जटिल भाव अभिव्यक्तियों को धारण करते हैं। मेरी बात बस इतनी थी कि जातीय छ्न्द की पहचान के चक्कर में लोग सरलता से कटे और फिर आसान राह पकड़ लिये जो लगती राजमार्ग की तरह थी लेकिन उसका कनेक्शन गाँव की गलियों, सड़कों से रहा ही नहीं। साहित्यकार को दोनों को साधना था। इसमें कवि सुलभ फिसलन सी कोई बात नहीं, समझ की बात है। (जारी)7 hours ago · Like · 2 people
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अब आते हैं राजभाषा हिन्दी पर। कोई भी भाषा चाहे जैसी हो, दूसरी भाषा की विरोधी नहीं होती। हमारी मंशा उसे ऐसा या वैसा बनाती है। यहाँ इतना लम्बा डिबेट किस भाषा में हो रहा है? आप मानें या न मानें सौ एक वर्षों में 'राजभाषा हिन्दी' स्थापित हो चुकी है और अब कोई भी समय के चक्र को पीछे नहीं ले जा सकता। आप इसके रूप पर बहस कर सकते हैं, लोकभाषाओं से इसके जुड़ाव को और पुख्ता कर सकते हैं लेकिन इससे अलग नहीं हो सकते और न यह लुप्त होने वाली है। यह आज सम्वाद की भाषा है। भोजपुरी और मैथिल जब मिलते हैं तो इसी 'गढ़ी गई जुबान' (जुबान ही कहा मैंने) में बात करते हैं और इस राजभाषा के कई लोकल रूप हैं। भाषा तो विकसित होती रहती है। शब्द तक लुप्त होते हैं और जुड़ते हैं। इतिहास नहीं वर्तमान की बात कीजिये। नई अवधी, ब्रज, मैथिल पीढ़ी की जुबान में जाने कितने अंग्रेजी के शब्द घुसे पड़े हैं। शासन काम काज ने हिन्दी के सामने भी अंग्रेजी को एक अति जबर प्रतिस्पर्धी की तरह रखा है। इसकी जटिलतायें आप तब और बेहतर समझेंगे जब इस तंत्र की फंक्शनिंग के भीतर जायेंगे, उसका हिस्सा बनेंगे। आज अगर इतने दिनों तक अंग्रेजीदा बने रहने के बाद प्राइवेट सेक्टर हिन्दी इंटरफेस ला रहा है तो उसके पीछे बहुआयामी आहटें हैं। उसे समझने की जरूरत है यह समझने की भी जरूरत है कि हिन्दी या लोकभाषा की कविताई आज लोक में कितनी बची है और कितनी प्रासंगिक है। मनोरंजन के साधनों को भी देखना होगा। हम सूर, कबीर, तुलसी या भारतेन्दु के ज़माने में नहीं रह रहे। इतिहास की गड़बड़ियों से आती धारा को मोड़ा जा सकता है, उनके उदाहरण दे अब तक के विकास को खारिज नहीं किया जा सकता। इतने ठहराव का आज युग नहीं है। आप लोग जहाँ हैं, वह एक बहुत ही प्रतिष्ठित संस्थान है जहाँ फंड और साधनों की कमी नहीं। आवश्यक है कि युवा बैठ कर हिन्दी को लोकभाषाओं से संस्कृत करने के ठोस आयोजन करें और एक वैकल्पिक सशक्त प्लेटफॉर्म सामने लायें। यह प्लेटफॉर्म नये आते और पुराने जाते छात्रों के बीच प्रवाहमान रहे। नौकरी और रोटी के तनावों और उलझनों के बावजूद विश्वविद्यालय के आँगन में एक परम्परा के रूप में जीवित रहे। फेसबुक प्लेटफॉर्म ऐसे आयोजनों के सहायक मंच के रूप में तो प्रयुक्त हो सकता है लेकिन व्यावहारिक हल के मामले में यह शून्य है और यह इसकी ही नहीं ब्लॉग, ट्वीटरादि सभी मंचों की सीमा है। सीमा से मेरा यह अभिप्राय था।
7 hours ago · Like · 2 people
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मित्रों ! (मुख्यतया अमरेन्द्र जी और दीपांकर जी) अब चर्चा में में शामिल रहना बहुत उपयोगी नही लग रहा इस लिए लगभग अपनी बात पूरी करते हुए.....
'...समानो मन्त्रः समितिः मे समानी..' के जिस आधार पर चर्चा मे था.. लगता है वह नही है...यहाँ से सोच के वे अंतर स्पष्ट हो रहे हैं जहाँ अपनी ही अपनी कहे जाने का माहौल बनेगा |
अमरेन्द्र भाई ! आपके मुताबिक़ राष्ट्र की किसी एक संवाद-भाषा की कल्पना हिटलरशाही होगी तो अब क्या कहूँ आगे ?? हाँ इतना जरूर कहूँगा कि चंदबर दाई ने जो भाषा चुनी क्या वही उस देश-काल की जनभाषा थी ? क्या कीर्तिलतादि लिखे जाने के समय मैथिली नही थी ? क्या द्विजदेव , लछिराम भट्ट , जगन्नाथ दास रत्नाकर , द्विजेश जी और इस तरह कहें कि स्वयं तुलसी ब्रज भाषी थे ? या फिर ये सब किसी हिटलरी वृत्ति के समर्थक अथवा शिकार थे ?
दीपांकर जी को ड्राइंग रूम में बैठ कर लिखे गए हिन्दी जैसे किसी मानकीकृत व्याकरण से इत्तेफाक नहीं(वैसे ऐसा कोई व्याकरण हो तो मैं भी जानना चाहूँगा, कुछ किताबों के नाम के सिवा ) हाँ अगर वो पाणिनि की तरह लिखा गया हो तो बात और है..वैसे पाणिनि की कौन सी जीवनी पढ़ी है दीपांकर भाई ने...? हिन्दी का कोई नेटिव स्पीकर नही था....पाणिनि को संस्कृत का कौन सा नेटिव स्पीकर मिला था जानना चाहूंगा....तब जबकि संस्कृत के कविकुल गुरु कहलाने वाले कालिदास अपने नाटक में संवाद में औचित्य-विचार से 'प्राकृत' का प्रयोग करते हैं...और पाणिनि ने कहाँ घूमकर संस्कृत संभाषण सुना था जिससे उनका व्याकरण प्रशस्त हुआ ?
अमरेन्द्र जी जिन (?) भाषा शास्त्रियों के मुताबिक़ लहजे के भेद को भाषा का भेद न मानना आपको स्वीकार्य है वे हिन्दी और अवधी के विषय में क्या कहते हैं ?
अवधी का कौन सा मानक रूप है जिससे उसके अंतर्वर्ती भेदों के पार्थक्य या ऐक्य को निर्धारित किया जाय और वो कौन सा व्याकरण है जिससे हिन्दी>अवधी, हिन्दी>भोजपुरी आदि का सैद्धांतिक भेद समझा जाय....क्या संस्कृत के अलावा भी कोई स्वस्थ व्याकरण है हिन्दी का ?..बहरहाल..तर्कोप्रतिष्ठः...
गिरजेश राव जी के उपर्युक्त दो कथनों का मैं अनुमोदन करता हूँ...3 hours ago · Like · 1 person
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Girijesh जी, यह शर-संधान/शास्त्रार्थ/जीत क्या है प्रभु! हम तो नाम टैग कर-कर के बुलाबुलाकर बतिया रहे हैं, क्योंकि मेरा ही स्वार्थ है, मेरा ज्ञान-वर्धन हो और मैं करेक्ट होऊं, लेकिन तर्क के साथ, बस यही मंशा रहे अब तक। गीता जी प्रभृति व्यक्तियों को देये गये मेरे उत्तर को देखिये, कोई शर-संधान/शास्त्रार्थ/जीत नहीं है, सिवाय यह कहने-सीखने की कामना के, आपको यदि शर-संधान लगा तो क्षमा माँग ले रहा हूं, पर आपने जैसा मुझे दिया आपको वैसा ही देने का प्रयास किया मैने। आपको जो मिला उसे पूरे विमर्श का मूल चरित्र कहने की भूल न करें आर्यवर ;-)
अभी व्यस्त हूं, आपके प्रश्नों के उत्तर देने का यत्न जरूर करूंगा, संभव है कल शाम हो जाये, व्यस्तता बढ़ गयी है।35 minutes ago · Like
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Amrendra Nath Tripathi Mahesh Mishra Maral जी, जो प्रश्न दीपांकर जी से आपने किये हैं, उनका उत्तर संभव है वे ही दें, बाकी प्रश्नों का उत्तर मैं दूंगा, संभव है कल शाम हो जाये, व्यस्तता बढ़ गयी है। सादर..!
33 minutes ago · Like
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महत्ता
- छंद (2)
- छंद का व्यापक अर्थ (1)
- छंद-प्रकरण (2)
- छन्द (1)
- छन्द-प्रकरण (1)



















